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मेरी परिभाषा

मैं
अब नहीं होना चाहती,
संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण,
न चाहती हूँ
अलंकार कोई,
किसी छंद में डूबा हुआ,
मैं किसी प्रतीक से,
नहीं चित्रित करना चाहती,
अपना अस्तित्व,
न मैं रूपकों में
चाहती हूँ उपमा कोई,
मैं सभी रसों से मुक्त हो,
विश्व-व्याकरण से बाहर आ
एक रिक्त स्थायी भाव
बन जाना चाहती हूँ,
जो शून्य में मौन-लिपि से
लिखा जा सके,
पढ़ा जा सके।

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आप की तारीफ

नमस्कार!
बहुत प्रसन्नता हुई आपसे मिलकर। क्या मैं जान सकता हूँ आपका शुभ नाम?
जी क्या करेंगे आप नाम जानकर?
कुछ खास नहीं, बस नाम जान लेने से एक पहचान का बोध हो आता है।
पहचान तो स्वयं मिथ्या है। आप जान लीजिए कि मैं जो हूँ, जो दिखता हूँ दरसल मैं वो हूँ ही नहीं, और जो मैं हूँ वो मैं बन ही नहीं पा रहा।
ह्म्म्म!
क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आप क्यों वह नहीं बन पा रहे जो आप हैं?
यह एक सही सवाल हो सकता है अगर मैं इसका जवाब सही दे सका तो! बात यह है कि इस नाम के चक्कर में ही फस कर रह गया हूँ। अब गुमनाम हो जाना चाहता हूँ।
परंतु जो पहले ही आपका नाम जानते हैं उनका क्या?
जब वे मुझे मुझसा जान जाएंगे तो मेरा यह नाम उनके लिए बेमानी हो जाएगा।
आपकी बातों से उदासीनता की महक आ रही है। भला जिस नाम के लिए सारी दुनिया इतने जतन कर रही है आप उसे ही छोड़ देना चाहते हैं। लगता है आपने इस नाम के चक्कर में कोई गहरी ठोकर खाई है।
कह सकते हैं आप ऐसा भी। किन्तु शेक्सपियर के what’s there in name ने मुझ पर इस गहराई से चोट की कि मैं नाम की माया से बाहर निकल आया।
तो क्या अब आप नाम नहीं कमाएंगे?
जब माँ पिताजी ने नाम रखा था तो प्रेम-वश रखा, स्कूल पहुँचते ही नाम वह सीरियल नंबर बन गया जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं था कक्षा की मोटाई कम अधिक होती तो वह नंबर भी अपनी जगह से हिल जाता। कॉलेज पहुंचने पर वही नाम नोटिस बोर्ड का हिस्सा बन गया जो हर लापरवाही में सबसे ऊपर लिखा जाने लगा चाहे वह अनुपस्थिति हो या अनुत्तीर्ण हो।
तब यह विचार आया कि इस प्रकार की व्यवस्था से किसी को भी क्या हासिल है। क्यों ये नोटिस बोर्ड हमेशा नकारात्मकता का हिस्सा बनता है और यदि बने भी तो मुझे क्यों इसका हिस्सा बनाया जाता है। हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में क्यों ऐसी व्यवस्था नहीं जहाँ कोई अपनी रुचि के अनुसार शिक्षा ग्रहण कर सके। क्यों मैं शेक्सपियर, चेखव, रिल्के, पढ़ कर समाज में अपनी हिस्सेदारी नहीं दे सकता। क्यों वे हमें यंत्री के स्थान पर यंत्र और चिकित्सक के स्थान पर संवेदना हीन बूत एवं ऐसे ही अनेक उदाहरण बना कर छोड़ देना चाहते हैं केवल नाम कमाने को। बस उस समय से ही नाम से मोह भंग हो गया।
तब आप क्या चाहते हैं?
मैं कुछ भी चाहना नहीं चाहता हूँ।
तब तो आपका जीवन व्यर्थ है। बिन चाह के आपको कोई राह कैसे मिले।
है तो चाह कुछ भी न चाहने की। किन्तु अब इसे भी समाप्त कर रहा हूँ।
जब कोई चाह ही न होगी तो क्या रह जायेगा आपके जीवन में। बिन नाम और चाह के तो आप जीते हुए भी मृत हो जाएंगे।
तो क्या आप नाम और चाह के साथ पूर्ण रूप से जीवित है?
जी हाँ, मेरी इच्छाएँ ही मुझे जीवित रखती हैं।
जी अवश्य और दुखी भी।
परंतु यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ?
आप जीवित हैं या नहीं?
आपको क्या लगता है?
मुझे तो संदेह है। मैं आप को जीवित मानने को तैयार नहीं।
फिर तो आपको बहुत रोमांच होगा एक मृत मनुष्य से आमने सामने बात करने पर।
कोई रोमांच नहीं मुझे, हाँ आश्चर्य अवश्य है कि आप जीते जी मृत हो जाना चाहते हैं।
नहीं मैं जीते जी मृत नहीं हुआ। मेरा नाम हटाकर आज आपने मुझ मृत आत्मा से जीवन्त बात की। यह यो मेरी मृत्यु पर विजय हुई। और यही प्राप्त करने तो मैं निकला था नाम तक छोड़ कर।

ऊँट किस करवट बैठेगा।

बड़ी भारी समस्या हो गयी यह तो। हमारा पूरा खेल इस ऊँट पर टिका है और ये ऊँट है कि बैठने का नाम ही नहीं लेता।
पर बैठ क्यों नहीं रहा है यह ऊँट?
शायद इसे भी पता लग गया है कि जब तक यह खड़ा है इसकी आव-भगत है। इसके बैठते ही खेल समाप्त और उसके साथ इसकी आव- भगत भी।
तो अब करें क्या?
इंतजार के अलावा कर भी क्या सकते हैं। अब ऊँट कोई आदमी तो है नहीं कि कह दिया तशरीफ़ रखिये तो रख ली तशरीफ़। ऊँट का अपना मिज़ाज होता है। बैठना होगा तो बैठेगा नहीं तो नहीं बैठेगा।
तुम्हें याद है कि आखरी बार कब बैठा था यह ऊँट?
हाँ- हाँ क्यों नहीं, बिल्कुल याद है। अभी कुछ दिनों पहले ही बैठा था, मेरी किस्मत पर। फिर उठने का नाम नहीं ले रहा था। इस ऊँट को उठाने के लिए न जाने कितने अनुष्ठान कराए। फिर एक पंडित ने ऊंटनी के पैर में घुँघरू बाँधने की सलाह दी और कहा कि उसे लाल रंग की गोटे वाली चादर ओढ़ा कर इस ऊँट के सामने लेकर आऊँ तो यह उठ जाएगा। पूरे इक्यावन सौ लेकर यह नुस्खा बताया और यकीन मानो जैसे ही मैं उसे इसके सामने लेकर आया, ऊँट उठ गया।
तुम्हारी किस्मत का क्या हुआ?
वह थोड़ी दब गई। पंडित जी ने उसे उठाने के लिए ही लिए ही दोबारा ऊँट के बैठने का उपाय बताया है।
तो क्या तबसे ऊँट बैठा ही नहीं?
अरे! यही तो मुसीबत है कि यह सूरज ढलते ही बैठ जाता है और रात भर मजे से बैठा रहता है, और पौ फटते ही उठकर खड़ा हो जाता है और उसके बाद दिन भर नहीं बैठता। और पंडित जी के अनुसार इसके दिन में दाहिनी करवट पर बैठने से ही मेरी किस्मत दोबारा उठेगी।
मान लो कि यह कभी दिन में बैठा ही नहीं?
अरे ऐसे कैसे नहीं बैठेगा, पंडित जी अनुष्ठान कर रहे हैं इसके बैठने के लिए और मैं भी रात दिन इसकी सेवा में लगा हूँ कि यह शीघ्र ही बैठ जाये।
किन्तु यदि यह बैठा भी तो यह कैसे सुनिश्चित हो कि यह दाहिनी ओर ही बैठेगा?
उसका भी उपाय है। पंडित जी के अनुसार मुझे इसके पीछे ही रहना है जैसे ही यह बैठने को होगा मैं इसके बायीं ओर जाकर खड़ा हो जाऊंगा। इसे जगह नहीं मिलेगी और यह दाहिनी ओर बैठ जाएगा, और इसके बैठते ही मेरी किस्मत उठ जाएगी।

बड़े ही पहुँचे हुए पंडित मालूम होते हैं वे।
हाँ सो तो है।

तब तो सच में तुम्हारी किस्मत ऊँट के बैठते ही उठ जाएगी, करोगे क्या तुम उसके बाद। अरे भाई कुछ न करना पड़े इसलिए तो इतने अनुष्ठान कर ऊँट को बिठा रहा हूँ दाहिनी ओर, फिर सब किस्मत ही करेगी और में आराम से ऊँट पर बैठ कर मौज करूँगा।

​माफ कीजियेगा! 

माफ कीजियेगा!

गलती हो गयी हमसे, या यूं कहें की बहुत सारी गलतियाँ हुई हैं अब तक।

परंतु आप तो दयालु हैं हमें पूरा यकीन है कि आप हमें क्षमा जरूर कर देंगे। नहीं आप हमारा अस्तित्व नहीं मिटाएंगे बस इस बार बक्श दीजिये। हम् एक एक करके सभी गलतियाँ कबूल लेते हैं आपके सामने। पहली गलती कि हमने लड़की के रूप में जन्म लिया। आपके कुटुम्ब की नाक काट दी पूरी, कितना जश्न मनता जो हम लड़का पैदा हो जाते। देखिए इस अपराध की तो हम घुटनों पर क्षमा मांगते हैं। ऐसे ऊंचे कुटुम्ब में जहां सदा ही पहली औलाद लड़का होना चाहिए उसे हमने पैदा होते ही कलंकित कर दिया, सच पूछिए आज तक पछतावा है हमें इस अपराध का। अब ये कम था कि हम ज्ञानवान भी हो गए। कितनी निकृष्ट बात है यह कि हममें अपनी उम्र के लड़कों से अधिक ज्ञान और संवेदनशीलता है। यह तो लगभग अक्षम्य अपराध है। किंतु पुनः क्षमा याचना। क्षमा याचना हमारे सांवले होने की भी, एक तो लड़की का कलंक और उस पर भी साँवली। कैसे सामना करें हम आपके समाज का।

देखिए हम इस बात के लिए भी क्षमा प्रार्थी हैं कि हमारे भीतर इच्छाएँ हैं कुछ बनने की, पढ़ने लिखने की, अच्छा जीवन जीने की। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि हम आपके रीति रिवाजों की तरह चल पाएं, बंध पाएं आपके बनाये खूँटे से, आपके द्वारा बांधी हुई घंटी को गले में लटकाए रहें, और जब भी आप कुछ कहें हम हाँ में ही घंटी को हिलाएं। देखिए कितनी मेहनत कर रहें हैं इस देश में हम आपको प्रसन्न रखने के लिए। लीजिये हम यह कसम भी उठा लेते हैं की कभी भी सूरज को डूबते नहीं देखेंगे। और सर कटा लेंगे यदि किसी ने हमें बिन पर्दे के देख लिया तो। सम्मान का तो हम नाम भी नही लेंगे आपके सामने। चलिये अब यह भी मान लेते हैं कि आपके और ईश्वर के बीच का एक मात्र रोड़ा भी हम ही हैं वरना आप जैसी महान कौम का तो कबका संपर्क हो जाता ईश्वर से। और एक बात, भगवान करे ये माँ, बहन, बेटी, पत्नी, दोस्त जैसी मजबूरी कभी आप पर न पड़े, वैसे भी ये शब्द रिश्तों से अधिक गालियों में शोभा देते हैं। देखिए बस इस बार क्षमा चाहते हैं अपने जन्म पर, हमें विश्वास है कि आप दयालु हैं।

​हम से मिलिए हम देश और संस्कार हमारी जोरू (अच्छी भाषा में धर्म पत्नी)

बहुत आगे आ गए हम, खूब उन्नत हो गए, देखो कैसे बढ़िया ढंग से हमारी तरक्की हो रही है, कद, काठी, रंगत, संगत सभी तो निखर आयी है, और फिर बढ़ें भी क्यों न देश हैं हम, उन्नतशील से उन्नत होते। जब हम निकलते हैं तन कर, बन सँवर कर, पूरी चौड़ाई से तो अच्छे अच्छे हमारे जूतों में हमारी संस्कार की कढ़ाई देखते हैं। संस्कार हमारी जोरू का नाम है जिसे प्यार से बीवी या धर्मपत्नी भी कहते हैं। बहुत सुंदर कढ़ाई कढ़ती है वह। उसकी कढ़ाई से ही आप उसकी खूबसूरती का पता लगा सकते हैं क्योंकि हमारी संस्कार को हम घर पर ही रखते हैं घूंघट में, सजा कर, घुंघरू वाली झांझर पहना कर जिससे उसकी सुंदरता तो बढ़ती ही है, और उसकी हर आहट पर हमारा ध्यान भी रहता है।

खैर छोड़िए धर्मपत्नी को, जब धर्म का कोई काम करेंगे तो बिठा लेंगे उसे भी बगल में हवन में आहुति देने अभी क्यों बेकार में समय गवाएं। वैसे समय हमारे सुपुत्र का नाम है। बड़ा ही चंचल है। असल में उसकी की जिद से हम उन्नत शील से उन्नत हुए हैं । देखो कैसी चालकी से समय ने शील हटा दिया उन्नत का, पर आप किसी से कहना मत। दरअसल उन्नत हमारे पड़ोसी की बेटी है खूब हवा में उड़ती थी, पढ़ लिख कर न जाने क्या बन जाना चाहती थी। भाई अब हम देश और हमारे बेटे समय का उन्नत पर दिल आ गया फिर क्या, अब कोई रोक पाया है क्या समय को उठा लाया उन्नत को, अब उन्नत भी हमारे घर के दरवाजों के पीछे रहती है घूंघट में और क्यों न रहे भाई, देश हैं हम, बेटा है हमारा समय।

अरे आप हमें गलत मत समझिए कोई दुश्मनी नहीं है हमारी औरतो से, बल्कि हम तो दूसरी जात वालों से ज्यादा इज्जत देते हैं अपने घर की औरतों को। अब धर्म में लिखा तो नहीं काट सकते न। देश हैं हम समाज के साथ जो रहते हैं। अरे समाज हमारे बाप का नाम है। वैसे तो सारा दिन पड़े रहते हैं बिस्तर पर खाँसते- खखारते परंतु कभी हमे संस्कार की बात तक करते सुन लें तो खाल तक खींचने खड़े हो जाते हैं। उमर भी गिद्ध की लिखा कर लाये हैं। एक बार संस्कार ने बड़े ही धीरे से कहा कि आज भावना नहीं आयी तो तमतमा कर बोले इस कुलक्षणी से घर का काम नहीं होता जो उस भावना के इंतजार में बैठी रहती है। भावना हमारी काम वाली है जिसके बगैर घर का काम तो नहीं चलता परंतु उसकी दो कौंड़ी की भी इज्जत नहीं है न तो हमारे घर में और न ही बाहर। परंतु समाज के आगे मुंह नहीं खोलते, भले ही देश हैं हम।

Article

इच्छा से अपेक्षा तक…

अपरंपरागत स्त्री

मैं एक

अपरंपरागत 

स्त्री हूँ,

क्योंकि मुझमें ज्ञान है,

और मैं ज्ञान से जानती हूँ।

मैं पुरुषों के लिखे 

इतिहास में नहीं हूँ,

पर मैं पुरुष के होने का साक्ष्य हूँ,

इतिहास में,

वर्तमान में,

और भविष्य में भी।

मैं परंपरागत इसलिए भी नहीं,

कि मैं पुरुष की पशुता, और शूद्रता,

न बन सकी,

और न बन सकी उसकी

श्रेष्ठता का रोड़ा।

मैं अपरंपरागत हूँ

क्योंकि मैं पूर्ण हूँ,

स्वयं से,

अपने भीतर के श्रेष्ठ पुरुष से।

और वे अधूरे हैं,

क्योंकि वे अपने 

भीतर की स्त्री को 

कलंकित कर मार चुके हैं।

माँ

तुम से इस धरा तक,
एक संस्कार आता है,
जो भर कर प्राण जीव में,
जीवित कर जाता है,

अवयक्त से करता व्यक्त,
वह चेतना जगाता है,
निराकार तुम्हारे रूप को,
साकार कर जाता है,

भर देता है वह प्रेम से,
ज्ञान को उपजता है,
जो शक्ति का पर्याय है,
वह भाव ‘माँ’ कहलाता है।

स्त्री मन

आज मेरे भीतर के पुरुष ने,
मेरे भीतर की स्त्री को देखा,
कितनी निर्मल, कोमल, स्वच्छ,
किसी छोटी चिड़िया सी,
देख रही थी इधर उधर,
बैठी हृदय के झूले में,
कुछ सकुचाती,
कभी पीछे को होती कुछ कदम,
कभी आगे बढ़ आती,
मेरे भीतर,
सौंदर्य जागती,
मातृत्व जागती,
हृदय के छोटे हिस्से का,
कोना स्वच्छ कर देती,
बड़ी मधुरता से
मेरे मन को कोमल कर जाती।

दरार

उस सदियों पुराने महल की
दीवार की छोटी सी दरार देख
कायस लगने लगे
जल्दी ही ढहेगी,
मिट्टी में मिलेगी,
और मिट जाएगा
नामोनिशां
यहाँ के बाशिंदों का
जो सुबह से शाम करते है
इस छत के नीचे
शिद्दत से काम करते है,
सुनते है
किस्से कई
कैसे इसकी नीव पड़ी
कुछ चश्मदीद
आगाज सुनते है
कुछ इस जगह को
मनहूस बताते है
इस महल की गिरह में
हैं कई राज़ गहरे
राजा के इस महल के
होते थे कइ चेहरे
सच उसने आज तक भी
एक बार न कहा था
कोई भी नेक मंत्री
उसने नहीं चुना था
छल था कपट भरा था
लालच जो सर चढ़ा था
लगने लगी थी बोली
सौदे लगे थे होने
होते थे पद से ऊँचे
रहते थे मन से बौने
थे बेचने वे निकले
हर ईंट उस महल की
रोता रहा महल वह,
और रूह हुई छलनी,
बेबस था बेसहारा
अन्याय देखता था
सुनता था लाखों चीखें
कानों को भींचता था
कईयों की मौत देखी
कई पाप का गवाह था
अपनों को जाते देखा
पर रोक न सका था
बूढ़ा नहीं था इतना
जितनी पड़ी दरारें
तकलीफ सहते सहते
ख़ामोशी से खड़ा था।