परमपिता

वह,
निकल जाता है,
प्रतिदिन,
सुबह,
तलाशने रास्ता,
जो पहुँचा दे,
उसे,
प्रकाश के
अद्वितीय स्रोत तक।

वह,
सहेजता है,
प्रतिदिन
प्रकाश की
बिखरी हुयी किरणों को,
और ढूंढता है,
वह किरण,
जिसे पकड़ कर,
वह पहुँच जाये
प्रकाश के,
अद्वितीय स्रोत तक।

वह
ढ़लते हुए दिन में,
प्रतिदिन
समेट कर
सभी किरणें
अपनी आँखों में,
आँखे बंद कर लेता है,
और उतार लेता है,
हृदय में अपने
प्रकाश के,
अद्वितीय स्रोत को।

वह
रात के अँधेरे में,
सुनता है
अपने मौन को,
जिसे
वह सदियों से
अपने गर्भ में
पाल रहा,
जो जन्म लेता है
उसके ही भीतर,
बनकर,
प्रकाश का
अद्वितीय स्रोत।

वह पुत्र अब स्वयं का
पिता कहलाता है।