हम मरते नहीं..

क्या था अलग मुझ में तुझ में,
कुछ नहीं..
कुछ भी नहीं..
कुछ भी तो नहीं..
मैं देखता तू देखता,
मैं कहता, सुनता, समझता,
महसूस करता दुःख,
रोता, बिलखता, चिल्लाता,
तुझ से गुहार लगता,
तेरी ही तरह मेरी जिन्दगी की,
जो बस अभी शुरू हुई थी,
कुछ करता, बनता, तेरे गम बांटता,
शायद तुझे नयी राह दिखता,
क्यूँ उगला जहर?
क्यूँ काट दिया जड़ से मुझे?
क्यूँ हत्या की?
मेरे साथ मेरे परिवार की,
क्या हुआ हिसाब?
या अभी बाकी है?
कब होगा पूरा?
कितनी लाशें?
कितनी चीखें?
तुम सदा खुद को मरोगे,
हम नहीं मरेंगे,
क्यूंकि हम मरते नहीं,
हम तो जी रहे है,
जो जिन्दा है उन सब में..

भोपाल गैस त्रासदी (2)

आज फिर हुई सुबह उस भयानक रात की,
अफ़सोस बाकी रह गया इंसा के उस जज़्बात की,
ज़हर घोला फिजा में या ज़िन्दगी कर दी तबाह,
उजाड़ गया ये गुल चमन, बाकि बस साया रहा,

मर गए जो मर गए, जो रह गए वोह मर रहे,
मिट गए सब धर्म-मजहब मिट ही जब इंसा गए,
सो गए सब नींद में लेकर जलन सी आँख में,
ली आखरी जब सांस तो थी घुटन भी सांस में,

गा लिया मैंने भी दुःख, उन झुर्रियों के साथ में,
रो लिया मैंने भी कुछ पल बेबसों के साथ में,
हो गया हिसाब, सबका जो मरे, जितने मरे !!
किसको थी फुर्सत की त्रियंच का ब्यौरा करे?

बिक रही है रौशनी कोई ज़रा खरीद दे,
और कालिख रात की कोई ज़रा सी कम करे..