वज़ूद

तुम्हें देखकर तुम से मिलना भूल जाती हूँ,
केहना चाहूं सब मगर कुछ कह न पाती हूँ,
यूं तो अक्सर मिलती हूँ तुमसे मैं ख्वाबों में,
पर सामने पाकर तुम्हें मैं खुद खो जाती हूँ,
सुना है मैंने लोगों से, है जुदा तू लाखों मैं,
पर तुझे सोचते हुए अलग सी मैं हो जाती हूँ,
रोज़ कई बातें करती हूँ तेरी मैं औरों से,
जाने क्यूँ तुझसे बातें करते मैं घबराती हूँ,
तुमसे मिलना मिलकर चलना बात है किसमत की,
तुमसे मिलकर अक्सर गुमसुम सी मैं हो जाती हों,
यूँ तो लाखों में नाम है तेरे चाहने वालों के,
पर अपनी चाहत को सबसे ऊपर मैं पाती हूँ,
छोड़ते हैं घर, बार, पैसा लोग चाहत मैं,
तेरे लिए वज़ूद मैं अपना छोड़ जाती हूँ,