स्त्री मन

आज मेरे भीतर के पुरुष ने,
मेरे भीतर की स्त्री को देखा,
कितनी निर्मल, कोमल, स्वच्छ,
किसी छोटी चिड़िया सी,
देख रही थी इधर उधर,
बैठी हृदय के झूले में,
कुछ सकुचाती,
कभी पीछे को होती कुछ कदम,
कभी आगे बढ़ आती,
मेरे भीतर,
सौंदर्य जागती,
मातृत्व जागती,
हृदय के छोटे हिस्से का,
कोना स्वच्छ कर देती,
बड़ी मधुरता से
मेरे मन को कोमल कर जाती।