राम कहाँ हो?

मर्यादा पुरुषोत्तम, दशरथ नंदन, कौशल्या के राम कहाँ हो?
लाचार विश्व और करुण हृदय अब करते यही पुकार कहाँ हो?

और कहाँ तुम से ज्ञानी की कही गयी वे दुर्लभ बातें?
न्याय, सत्य-निष्ठा से वचन का पालन करने की सौगातें।

कहाँ गए वे वंशज सारे जो तिलक सूर्य धरते थे माथे?
और कहाँ वे शुरवीर जो वचनबद्ध हो प्राण गंवाते?

होते नहीं वे पुत्र आज जो पिता की आज्ञा सर धरते थे,
मुख से निकले एक वाक्य को अक्षरशः पूरा करते थे।

ना ऐसा निर्मोही राजन जो क्षण भर में राज त्याग दे,
भ्रातृ प्रेम के लिए सिंहासन और सत्ता का पूरा भाग दे।

ना होता कोई आज महात्मा जो भक्तों के भाव को जाने,
रह कर पर्न-कुटी में उनकी जो उनको अपना ही माने।

ऐसा कोई संत नहीं जो वर्षों तक भूखा रह जाए,
अपने भक्तों के जूठे भोजन से स्वयं का भोग लगाये।

ना कोई ऐसा वीर ही देखा देकर मृत्यु जो बना  अमर दे,
जो हृदय के विकार मार कर आत्मा को कुंदन सा कर दे।

महापुरुष ऐसा ना कोई जो भार्या को अर्धांग्नी जाने,
उसकी लज्जा की रक्षा को अपना परम धर्म ही माने।

नहीं आज वे पुरूष की जिन्होंने एक स्त्री को सुता था मना,
और अन्य को अपनी माता, बहिन, पुत्री, पहचाना।

ऐसा कोई कहीं नहीं जिसको प्रकृति ने अपना जाना,
वानर ने तुम्हें प्रेम से पूजा, साथ निभाया, प्रभुवर माना।

विशाल सागर पार लगाकर जटायु मृत्यु से जीत के आया,
और तुम्हारी भार्या के अपहरण का संदेशा लाया।

तुमसे महापुरुष कब ऐसी बातों से विचलित होते थे,
हो घमंडी दुष्ट रावण सा पर आप नहीं आपा खोते थे।

एक तुम्हारे दृश्य मात्र से सारे संकट मिट जाते थे
और तुम्हारे नाम मात्र से लाखों शिला तैर जाते थे।

जब तुमने रावण को स्वयं ही शांति का संदेशा भेजा,
उसने गर्व से तुम्हारे दूत को कम आँका और पांसा फेका।

पर जिस भांति तुम्हारे साहस को कोई डीगा न पाया
ठीक उसी तरह तुम्हारे दूत के पग को हिला ना पाया।

माता सीता के समक्ष, जिस भक्त ने थी मुंदरी पहुंचाई,
उसने तहस-नहस की लंका आग लगाकर फूँक जलायी।

रावण था शिव-भक्त बड़ा खुश करने लाखों यज्ञ कराये
पर अनभिज्ञ था इस प्रताप से शिवधनुष तोड़ तुम आये।

या यूँ कह दे महाज्ञानी था जो तुमको पेहचान गया था
और अपनी मुक्ति के मार्ग को पूर्ण रूप से जान गया था।

तुमने मुक्त किया तीनो को पिता, पुत्र और एक भाई
और भेजा लक्ष्मण को सीखने रावण से प्रभुता दिखलायी।

लौट गए सीता संग लेकर कर वनवास पूर्ण जब अपना,
सारा देश सजा दीपक से पूर्ण हुआ दशरथ का सपना।

परंतु प्रजा के राजा की अभी और परीक्षा कठिन थी बाकी,
हुई सीता की अग्नि परीक्षा सीमा जो लक्ष्मण की लांघी।

क्या गाऊँ गुण राम तुम्हारे तुम मनुष्य में देव हो गए,
और प्रजा को त्याग, तपस्या, पुरुषार्थ दया की सीख दे गए।

मैं एक पथिक

मैं एक पथिक,पथ एकाकी,
मैं आगे बढ़ता जाता हूँ,
वे राह में कांटे बोते है,
मैं हँस कर फूल उगाता हूँ।

चढ़ता हूँ तुंग शिखर पर मैं,
ध्वज विजय वहां लहराता हूँ,
अवरोधों को भी लगा गले,
नयी राह बनाता जाता हूँ।

आंधी तूफ़ान हों राहों में,
हो कितनी ही भीषण व्याधि,
एक पल को न विचलित होता,
मैं चलता चलने का आदि।

दिन प्रति की बाधाओं से,
रुक जाना मेरा काम नहीं,
बस एक काम बढ़ते रहना,
एक पल थमने का नाम नहीं।

मैं हूँ मैंने ही अवनि की,
छाती में अंकुर बोया था,
मैंने चीर शिखर बीच से,
नदियों का रुख मोड़ा था।

मैं ईश्वर की अद्भुत रचना,
मुझमें चैतन्य समाया है,
जड़ के दुःख से न डिगता मैं,
मुझ में आनंद समाया है।

मुझको बौराया कहते वे,
वे कहाँ आदि हैं चलने के,
वे रुकते राह रोकते हैं,
वे व्यस्त हैं कांटे बोने मैं।

मैं उन सब का आभारी हूँ,
जिस जिसने भी यह काम किया,
राहों में बोकर कांटे,
मुझको चलने का काम दिया।