कृष्ण

जो दुःख में दुखी, न सुख में न फुले,
जो बहती हवा के रुख में न झूले,
भूख जिसे न तन की, मन की,
धरा रहे हरी, “हरी” मन की,
ठंडी,गर्मी या बरसातें,
या कितनी भी विषम हो राहें,
विष को भी अमृत में बदले,
चन्दन सम शीतलता भर दे,
चाहे फूल हो या हों कांटे,
सबको ख़ुशी बराबर बांटे,
सब की जो तृष्णा विनशाये,
बलिहारी वही “कृष्ण” कहाये।