धुँध

धुँध
आज प्रभात में रंग नहीं,
दृष्य नहीं, चाल नहीं,
चमक नहीं, भाव नहीं,
और कोई रौनक भी नहीं,
ऋतू आज फीकी है, ऋतू आज सिहरी है,
ऋतू आज भारी है, ऋतू आज ठहरी है,
फिर भी आकर्षण है,
हाँ!
धुँध में आकर्षण है,
क्यूँ?
धुँध आज मन की है,
और
मन आज फीका है,
हर दृष्य धुंधला है, दृष्टि जैसे बोझिल है,
आज हूँ धरा सी मैं, मन मेरा ओझिल है,
कठिन देख पाना है,
कठिन लगे बूझना,
जब दृष्टिगोचर हो,
तभी पड़े जूझना,
जैसा यह मौसम है, वैसा ही जीवन है,
हाँ! दृष्टी बाध्य है, पर हृदय में उत्साह है,
सच अच्छा लगता है,
रंगों को फीका देखना,
सच सच्चा लगता है,
लहू की धीमी चाल देखना,
सच यह भी अच्छा है,
की सूर्य आज मयंक है,
और अच्छा यह भरम है,
की प्रकृति की चाल मंद है,
भरम भी आवश्यक है,जीवन जीने के लिए,
और धुँध एक मानक है, जीवन कहने के लिए,
कल फीका धुंधला है,
कल गहरी धुँध है,
पल भर की दृष्यता,
फिर धुँधला सा रूप है,
धुंधला यह जीवन है, और धुँध ही साहस है,
धुँध कुछ पल की ही, सत्यता का आभास है।

मेज़

इस भाव न्यून दुनिया में,
भाव ढोना मुश्किल है,
दिमाग़ संकीर्ण है,
हर सोच ओछी है,
भारी है मन आज,
जीवन एक बोझ है,
बोझ है,
कड़वा है,
कड़वा हर सच की तरह,
और सच कितना अजीब,
पुरषों कि दुनिया मैं औरत निर्जीव,
सामान है,
उपयोग का,
उपभोग का,
और सामान भी कैसा?
जो बहुत ज़रूरी,
उपयोगिता तो सिद्ध है,
शायद कमरे में रखी मेज़ कि तरह,
जो ना हो तो लाखों सामान आएं ज़मीन पर,
सजती है कमरों के कोनो में,
या फिर कभी बीच में,
कोई आये तो पुछती है कभी,
पर उपयोग रोज़ होती है,
धूल भी खाती है,
खाख से मिलती है,
और कितना भी सामान हो,
रखने को तैयार,
अपने सिर पर,
या कमर पर,
पता नही!
क्या मेज़ों कि कमर भी होती है?
पता नहीं!
क्या मेज़ भी कभी रोती है?
या फिर खुश भी कभी होती है?
और एक बात!
मेज़ कि संख्या भी ज़रुरत अनुसार होती है,
बड़ा कमरा है तो मेज़ भी दो,
एक सामान रखने और एक सजाने को,
छोटा हो या बड़ा,
नयी या पुरानी,
सब चलने दो,
और ज़रुरत हो तो एक और आने दो,
और दफ्तरों में तो कई मेज़ होती हैं,
और अपने ऊपर कई फाइलें ढोती है,
अपने कमरे कि ख़राब तो दूसरे कि बुलवा लो,
पर मेज़ तो ज़रूरी है,
कई फाइलें ढोने,
कई और फाइलें ढोने को,
और फाइलों का भी मेज़ से बड़ा अजीब नाता है,
फाइल तभी आगे बढ़ती है,जब मेज़ के नीचे से कुछ आता है,
छी ये कैसा घिनोना खेल,
इस पुरुष प्रधान दुनिया में औरत का क्या मेल?
मेल न तो तन से,
मेल नहीं मन से,
और मेल कैसा एक जीव का निर्जीव से,
जीव भी कैसा जो चालक और तेज़ है,
और औरत का अस्तित्व तो बस एक मेज़ है।

भोपाल गैस त्रासदी

थी घनघोर काली और सर्द रात,
चारों और घोर सन्नाटा था,
थी आँखों की चुभन या अन्धकार,
कुछ भी तो नज़र ना आता था,
जिस की सुबह ना आई कभी,
क्या बोलूं ऐसी रात पे मैं!
और क्या बोलूं इस बात पे मैं?

हर तरफ मौत का मंज़र था,
ये शहर लाशों का समंदर था,
जाने वो कैसा दानव था,
जो इतना विकराल भयंकर था,
आंसू आंसू को रोकते थे,
क्या बोलूं ऐसे हालात पे मैं!
और क्या बोलूं इस बात पे मैं?

भय ही था जिसे कहा सबने,
भय ही था जिसे सुना होगा,
भय को सबने महसूस किय़ा,
भय का हर स्वाद चखा होगा,
भय को जिसने भय से देखा ,
क्या बोलूं ऐसे जज़्बात पे मैं!
और क्या बोलूं उस बात पे मैं?