उदयगिरि की गुफाएँ

उदयगिरि का अर्थ है सूर्योदय का पहाड़, मध्य प्रदेश के विदिशा के पास बीस रॉक-कट गुफाओं का एक ऐतिहासिक स्थल।

उदयगिरि गुफाएं भारत की कुछ सबसे प्राचीन हिंदू छवियों और गुफाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये गुफाएँ गुप्त काल के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल हैं। यहाँ चंद्रगुप्त द्वितीय (सी। 375-415) और कुमारगुप्त के शासनकाल से संबंधित गुप्त वंश के महत्वपूर्ण शिलालेख हैं। यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत संरक्षित है।

इन गुफाओं तक पहुंचना बहुत सरल है। भोपाल से 57 किलोमीटर दूर इन गुफाओं तक आप गाड़ी के सहारे एक घंटे में यहाँ पहुँच सकते हैं। यहाँ पहुँच कर आपको न केवल आध्यात्मिक सुख का अनुभव होगा अपितु आप स्वयं को गुप्त काल के बहुत समीप पाएंगे। आपको महसूस होगा कि इन ऐतिहासिक इमारतों से होकर आप उस शांति तक पहुँच सकते हैं जहाँ स्वयं भगवान का वास होता है।

उदयगिरि गुफा परिसर में कुल बीस गुफाएं हैं, जिनमें से एक जैन धर्म को और अन्य सभी हिंदू धर्म को समर्पित है। पाषाण पर की गई नक्कासी से निर्मित ये गुफाएँ साक्षी हैं मनुष्य के कला और भक्ति के प्रति समर्पण की।

उदयगिरि की गुफाओं में वैष्णववाद (विष्णु), शक्तिवाद (दुर्गा और मातृका) और शैववाद (शिव) की प्रतिमाएं हैं। ये गुफाएँ हिंदुओं की लोकप्रिय पौराणिक कथाओं का चित्रण करती है।

इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो उदयगिरि और विदिशा का क्षेत्र दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक बौद्ध और भागवत स्थल था, जैसा कि सांची के स्तूपों और हेलियोडोरस स्तंभ से प्रमाणित होता है।

जैन गुफा ४२५ सीई से सबसे पुराने ज्ञात जैन शिलालेखों में से एक के लिए उल्लेखनीय है, जबकि हिंदू गुफाओं में ४०१ सीई से शिलालेख हैं।

यूँ तो उदयगिरि आने के लिए कोई भी मौसम अच्छा है किन्तु आप गर्मियों में यहाँ दोपहर नहीं बिता पाएंगे। आपकी कला, इतिहास और अध्यात्म में रुचि है तो यह स्थान आपकी यात्रा के लिए सर्वोत्तम है किंतु यदि आपकी रुचि नहीं भी है तो भी इस जगह को इसकी खूबसूरती के लिए आप बहुत पसंद करेंगे। खाने पीने के लिए एमपीटी का रिसोर्ट है साँची में। तो जब भी भोपाल आएं साँची के साथ उदयगिरि का भी आंनद उठाएं।

आम की टोकरी

खासा विवाद चल रहा इस कविता को लेकर। इसलिए इस चित्र पर एक नई कविता कहने की सूझी।

चित्र: साभार NCERT की किताब से लिया गया, जो इंटरनेट पर चर्चित, और उपलब्ध था।

छह साल की काकुल आई,
संग टोकरी आम की लाई,

लेकर आम जहाँ भी जाति,
देख सभी को बड़ा लुभाती,

पूछे जो कोई दाम आम का,
उसको वह एक काम बताती,

जो भी काम वह पूरा करता,
उसे आम ईनाम में मिलता।

कोविड हो गया है तो घबराएं नहीं दवा खाएं, लंबी गहरी सांस लें, मुस्कुराएँ और गुनगुनायें

कोविड की कहानी 2019 में प्रारंभ हुई, जो अभी तक चल रही है। बीमारी को समझने मैं WHO जैसी संस्था को समय लग गया। पूरा विश्व हाथ धोने और शारीरिक दूरी बनाने पर जोर देने में लगा रहा जबकि मास्क के बिन इस बीमारी ने अपने पैर पसार लिए और अब दूसरी लहर में इसका विकराल रूप हम सब के समक्ष दिखाई दे रहा है। कोविड ने मरीजों के शरीर के साथ-साथ उसकी मनःस्थिति पर भी हमला किया। इन दोनों ही स्थितियों में मरीज के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को पुनर्वास की आवश्यकता पड़ती है जिससे उसे अपनी जिंदगी में वापस लौटने एवं आपने जीवन की गुणवत्ता बहाल करने में मदद मिले।

तो समझते हैं कि COVID-19 दे पीड़ित मरीज को कमजोरी, थकान, शारिरिक गतिविधि के साथ सांस की तकलीफ एवं चलने में और अपने दैनिक कार्य करने में कठिनाई होती है। अब,जब वह इन शारीरिक दुर्बलताओं का अनुभव करता है, तो यह स्थिति तनाव को जन्म देती है, जो नकारात्मक रूप से मन को प्रभावित करती है और अंततः डर और अवसाद का रूप लेकर शरीर के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

ऐसा पाया गया है कि इस बीमारी की शुरुआत में ही व्यायाम और शारीरिक गतिविधि के माध्यम से व्यक्ति के सम्पूर्ण स्वास्थ्य में सफलता मिल सकती है। यह व्यायाम आप स्वस्थता की ओर बढ़ते हुए अपनी बीमारी की एकांत अवस्था (आइसोलेशन) में घर पर ही शुरू कर सकते हैं।

क्या करें?
शरीर को हिलाना (मूवमेंट) प्रारंभ करें:
यह शरीर को रोगमुक्त करने में सहायता करता है साथ ही यह मनःस्थिति को बहाल करने और भावनाओं को शांत करने का एक उत्तम तरीका है।  शरीर को दैनिक जीवन के संचलन के साथ जोड़ने से हम व्यायाम की सहायता से आरोग्य अवस्था की ओर बढ़ सकते हैं।

पुनर्वास के इस कार्यक्रम को 3 चरणों में बंटा गया है जिसका लक्ष्य है कि आप पूर्णतः स्वास्थ्य होकर अपने जीवन के रास्ते पर लौट सकें और जीवन का आनंद उठा सकें। 

प्रारंभिक चरण

तो आईये जानते हैं प्रारंभिक चरण की सरल एवं उपयोगी कसरत के बारे में-

1. लंबी गहरी साँस लें: नाक से लंबी साँस गहरी सांस लेने से फेफड़े की कार्यक्षमता बहाल हो जाती है।

अ.अपनी पीठ के बल लेटें, अपने घुटनों को मोड़ें ताकि आपके पैरों का निचला हिस्सा बिस्तर पर टिका रहे।
• अपने हाथों को अपने पेट के ऊपर रखें या अपने पेट के किनारों के दोनों ओर रख लें।
• अपने होठों को बंद करें और अपनी जीभ को अपने ऊपर वाले तालु पर रखें।
• नाक से सांस लें और हवा को अपने पेट में खींचे जहां आपके हाथ हैं और उसे फैलाने की कोशिश करें एवं अपनी उंगलियों को अपनी सांस के साथ अलग करें।
• नाक से धीरे-धीरे सांस छोड़ें।
• एक मिनट के लिए गहरी सांसें दोहराएं।

ब. पेट के बल गहरी सांस लें
• अपने पेट के बल लेटें और अपने सिर को अपने हाथों पर टिकाएं ताकि आपके लिए सांस लेने के लिए जगह हो।
• अपने होठों को बंद करें और अपनी जीभ को अपने ऊपरी तालु पर रखें।
अपनी नाक से सांस लें और हवा को अपने पेट में नीचे की ओर खींचें।  अपने आप पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करें और महसूस करें की जब आप साँस ले रहे हैं आपके पेट गद्दे को धकेल रहा है।
• नाक से धीरे-धीरे सांस छोड़ें,
एक मिनट के लिए गहरी सांसों को दोहराएं।


स. आप करवट में लेटे हुए भी लंबी गहरी साँस ले सकते हैं।

2. हमिंग या सिंगिंग
गुनगुनाना सुखदायक है, यह आपको मानसिक तौर पर शांति देता है और तनाव को कम करता है और आपको ठीक होने में मदद कर सकता है।
• अपने बिस्तर के किनारे पर या किसी मज़बूत कुर्सी पर सीधे बैठें।
• अपने हाथों को अपने पेट के चारों ओर रखें।
• अपने होठों को बंद करके और अपनी जीभ को अपने मुंह की छत पर रखते हुए, अपनी नाक से सांस लें और
•अपने पेट में हवा को नीचे खींचें जहां आपके हाथ हैं।  साँस लेते हुए अपनी उंगलियों को अपने से अलग फैलाने की कोशिश करें।
• एक बार जब आपके फेफड़े भर जाएं, तो अपने होठों को बंद रखें और गुनगुनाते हुए सांस छोड़ें, जिससे “हम्मम्मम्म” की ध्वनि बन जाए। 
• अपनी नाक से श्वास लें, और फिर गुनगुनाते हुए अपनी नाक से श्वास छोड़ें।
• एक मिनट के लिए दोहराएं।

3. हवा खाते हुए मुस्कुरुराएँ
• अपने बिस्तर के किनारे पर या किसी मज़बूत कुर्सी पर सीधे बैठें।
• अपनी बाहों को ऊपर की ओर ले जाएं और एक बड़ी स्ट्रेचिंग जम्हाई लें।
• तीन सेकंड के लिए मुस्कुराते हुए समाप्त करें।
• इसे भी एक मिनट के लिए दोहराएं।

डॉ नेहल शाह,
BPT, MPT, Cardiothoracic
PhD (Faculty of Health Sciences)

स्वछ-भारत

एक रोज सपने में मेरे,
मुझसा ही एक बच्चा आया,
पूछा उससे नाम जो मैंने,
उसने झट भारत बतलाया।

सुंदर छवि पर कपड़े मैले,
जैसे कब से नहीं नहाया।
पूछा मैंने हाल जो उसका
बोला सबने मुझे सताया।

कूड़ा डाला मेरे ऊपर,
मेरे बाग को काट गिराया,
मेरी प्यारी-प्यारी नदियों में,
जाने क्या-क्या दिया बहाया।

उस दिन मैंने देखा तुमको,
तुमने मुझको साफ कराया,
मेरे प्यारे-प्यारे भाई,
इसलिए सपने में आया।

तुम अपने जैसा ही सबको,
स्वच्छता का पाठ पढ़ाओ,
तन मन को तुम स्वच्छ रखो
और पर्यावरण भी स्वच्छ बनाओ।

मैंने उस नन्हें भारत को,
सपने में ही गले लगाया,
अपने सभी मित्रों सा मैंने,
उसे भी पक्का दोस्त बनाया।

अगले दिन अपने मित्रों को
मैंने अपना सपना बतलाया,
प्रण लिया स्वच्छ भारत का,
और दूसरों को दिलवाया।

तबसे मेरा प्यारा भारत,
जब भी सपने में आता है,
सुंदर कपड़े, स्वच्छ काया में
हँसता और इठलाता है।

श्मशान में सत्य है।

श्मशान में सत्य है।

वह सत्य जो
तुम्हारी सुविधा से परे है,
अर्थात परम सत्य है।

ठीक वही सत्य जो
किसी मंदिर में
देव के समीप होता है।

नश्वर देह का सत्य
दाह का सत्य।

अरे!

मालूम नहीं इस देश के ये तस्वीरें कोई कैद कर रहा है या नहीं। यह भी नहीं मालूम कि किसी को फर्क पड़ रहा है या नहीं। पर इतना मालूम है कि मैंने मृत्यु के प्रति इतनी असंवेदनशीलता पहले कभी नहीं देखी। इसका कारण यह हो सकता है कि लोग बहुत संख्या में मर रहे हैं। मेरा अनुमान है कि अब तक शायद इस देश में कोई भी ऐसा नहीं बचा होगा जिसने किसी अपने को न खोया हो, फिर चाहे वो अपना, उसका कोई सगा, करीबी मित्र, या दूर का रिश्तेदार हो सकता है। अब आप ही अंदाज लगा सकते हैं कि डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में कितनी मौतें हुई होंगी, और अभी तो हम केवल महामारी के बीच में हैं। इस वक़्त जब कोई किसी के मरने की खबर सुनता है तो बस एक ही शब्द मुंह से निकलता है “अरे!” – इसके बाद कुछ बोलने को नहीं रह जाता। यह दौर ऐसा है जहाँ लोग डिजिटल सामाजिक मंच का भरपूर उपयोग करते हैं। किसी की मृत्यु की खबर पढ़ते ही ‘रिप’ या ‘ॐ शांति’ लिख कर आगे बढ़ जाते हैं, और फिर अपना काम में लग जाते हैं, बिन ये सोचे इस महामारी में हुई प्रत्येक मृत्यु की जिम्मेदारी इस देश में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति की है।


और एक कमाल बात है इस देश में रह रहे लोगों की, वे कभी अपने आप को दोषी नहीं देखते, उनकी कभी कोई गलती नहीं होती, वे बीमार भी होते हैं तो दोष सामने वाले का होता है, और उस सामने वाले के लिए उसके सामने वाले का होता है। वे तो बस शिकार होते हैं शायद इसी को अंग्रेजी में ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना कहते हैं। दरअसल इस बेचारगी की आदत उनमें बचपन से ही आ जाती है। वे इतने असुरक्षित माहौल में बड़े होते हैं जहाँ हर घड़ी उन्हें परखा जाता है, जैसे उनका जन्म किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए हुआ हो, जिसमें उन्हें केवल अव्वल आना है। फिर इसमें भी दो फ़ाड़ है, जो अव्वल आये वे उससे कम में असुरक्षित हो जाएंगे और बाकी बचे लोगों को जीने का हक ही नहीं, सो असुरक्षित ही मर जायेंगे। सो सब बेचारे हो गए। फिर इस भयंकर वायरस के फैलने की जिम्मेदरी ले कौन? अव्वल आने वाले लेंगे नहीं, और उनसे नीचे वालों की तो क्या मजाल कि वे कुछ फैला सकें। तो यह वायरस कैसे फैल रहा है कोई जानता नहीं?

कुछ लोग अपने आप को ऐसे भी बहलाये हैं कि किसी पड़ोसी देश ने जैविक हथियार छोड़ दिया, और उसको 2024 तक के लिए सेट कर दिया है। तो जब इस मानसिकता ने इस बीमारी को अपने दिमाग में 2024 तक सेट कर लिया, तब वे इसको फैलने से रोकने के लिए कोई उपाय करेंगे ही क्यों? वे तो मान चुके हैं कि उनके व्यक्तित्व से बड़ा वायरस का व्यक्तित्व है। और चलो एक बार को ये हाइपोथिसिस बना भी लें कि छोड़ दिया हथियार किसी ने, तो आप बचने का कोई प्रयास नहीं करेंगे, अपनी छाती आगे कर देंगे कि आओ वायरस घुस जाओ मेरे भीतर। हमारे पास उदाहरण है ऐसे देश का जहाँ सच में हथियार छोड़े गए, कई लोगों की जान चली गई, पूरे शहर ध्वस्त हो गए, किन्तु वे रिकॉर्ड कम समय में उठ खड़े हुए क्योंकि वहाँ कोई बेचारा नहीं रहता था। किन्तु हमें तो उदहारण केवल परीक्षा की कॉपी में पास होने के लिए लिखने हैं, असल जिंदगी में उदहारण से क्या सीखना। हम हर घड़ी अपने देश की गरीब जनता का हवाला देते रहते हैं, कहते फिरते हैं कि अस्पतालों में सुविधओं की कमी है, तो क्या हम इन असुविधाओं के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? हम भीख लेने में इतने मसरूफ हैं कि अधिकारों के बारे में सोचने की फुर्सत ही कहाँ है? इस महामारी ने इस देश में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति की कलई खोल कर रख दी। मुसीबत के समय एक दूसरे का साथ देने की बजाय हमने होड़ करी, धंधा किया, और तांडव किया और अब इतने असंवेदनशील हो चुके हैं कि किसी की मृत्यु पर कह रहे हैं -अरे!

लगता है कुछ ज्यादा लंबा लिख दिया!

ख़ैर..

वृक्ष-मन

वह उस वृक्ष की छाल पर,
अपनी अंगुली से
कुछ लिख देती है,
आहिस्ता से,
उस वृक्ष के मन पर,
गुदगुदा देती है उसकी,
पीठ कभी,
और कभी उसकी,
पत्तियों को सहलाते हुए
उसके बाल बिखरा देती है।
वह कभी उस वृक्ष की पीठ से,
अपनी पीठ टिका,
बैठ जाती है,
मौन-गीत गाती है।
ये रुके हुए वृक्ष,
रोक लेते हैं,
उस प्रेम के समय को,
सदा के लिये,
जहाँ बैठ कर,
युग करते हैं साधना,
उस वृक्ष के वर्तमान में,
उनके प्रेम के मौन-गान में,
कर मुक्ति-सूत्रों की रचना,
मुक्त हो जाते हैं।

सोनमर्ग, कश्मीर

घुटन

वह आधी रात को बाथरूम में जाने के लिए उठती है। वह देखती है-कॉकरोच! असंख्य! यह क्या? टॉइलेट से कतार की कतार निकल कर आ रही कॉकरोच की। कुछ उड़ रहे, कुछ उल्टे होकर तड़प रहे। छी! घिन आ रही है मुझे इनसे। यह क्या? ये वाश बेसिन के नीचे लगी लकड़ी में इतनी दीमक कहाँ से लग गई? बाथरूम के दरवाजे की चौखट भी सड़ गई है दीमक से। दरवाजे की परत फूल कर निकल रही। हे भगवान! इसके बीच में भी असंख्य कीड़े हैं। क्या करूँ? स्प्रे कहाँ है इन सब को खत्म कर दूंगी। हमेशा के लिए। मेरा मास्क कहाँ है? सब लेकर आती हूँ। सब पर छिड़क कर मार दूंगी आज। दीमक की दवा भी एक स्प्रे की बोतल में भर लेती हूँ। आज कोई भी कीड़ा नहीं बचेगा। सब की साँस रुक जाएगी, दम घोंट के अंत कर दूंगी एक-एक का।
वह स्प्रे लाती है और सभी कीड़ों पर छिड़कना शुरू कर देती है। उसके स्प्रे छिड़कते ही अनेकों कीड़े बिलबिलाने लगते हैं। कुछ उल्टे होकर तड़पने लगते हैं, कुछ एक झकटे में ही मर जाते हैं। स्प्रे की गंध से कोनों-कोनों से कीड़े निकलते हैं और दम तोड़ देते हैं। वह यह सब देख कर घबरा जाती है, पसीने-पसीने हो जाती है, उसकी चीख़ निकल जाती है। वह अपनी ही चीख़ सुनती है और कुछ जाग सी जाती है। उसे अचानक आभास होता है कि वह एक दुःस्वप्न में दब गई थी। वह उठती है और देखती है कि उसका स्वप्न अब भी चल रहा, चारों ओर लोग दम घुटने से मर रहे हैं। वह समझ नहीं पाती कि वह जाग गई है या अब भी नींद में है।

इश्क-ए-कश्मीर

बचपन में जब आप अपनी माँ के आँचल में छुप कर, परियों की कहानी सुन कर सोते हैं और मीठी नींद के किसी ख्वाब में एक ऐसी खूबसूरत जगह पहुँच जाते हैं जो आपके मन के अनुरूप हर क्षण बदलती है और हर बार आपको अपनी खूबसूरती से एक अद्भुत आश्चर्य से भर देती है, ऐसी अद्भुत स्वप्निल सौन्दर्य की धरा का नाम है कश्मीर जो भारत के राज्य जम्मू कश्मीर का हिस्सा है.

श्रीनगर, जम्मू- कश्मीर की राजधानी के हृदय की हलचल आप डल झील के रूप में महसूस कर सकते है. यह झील दर्पण है पूरे श्रीनगर का और यह दर्पण श्रीनगर को उसकी ख़ूबसूरती का निरंतर अहसास करता रहा है फिर चाहे इसके शाक्षी भगवान् बुद्ध हों या कश्मीर शैव दर्शन के प्रणेता आचार्य वासुगुप्त, मुग़ल सल्तनत के सुल्तान मीर शाह और उनकी पीढ़ियाँ हों या महाराजा रणजीत सिंह की रियासत. सभी ने इस सौंदर्य को ह्रदय से सराहा और इसका संरक्षण किया. श्रीनगर तक पहुँचने के लिए आपको जम्मू से बस, टैक्सी या हवाई जहाज की सुविधा ले सकते हैं. मैं यहाँ दिल्ली से हवाई यात्रा करके पहुँची. पहुँचते ही यहाँ कोई याकूब भाई आपको लेने तख्ती पर आपका नाम लिए मुस्कराहट के साथ खड़े आपका इंतज़ार कर रहे होते हैं. उनके साथ गाड़ी में बैठ कर हम पहुँच जाते है डल झील के किनारे पर जहाँ आखों के लिए झील की खूबसूरती किसी चमकते हीरों के ढेर की तरह दिखयी देती है, जिसकी न तो कभी इन आँखों ने कल्पना की थी और न ही कोई तैयारी.

गाड़ी रूकती है और सामने कोई वसीम भाई शिकारे पर बिठा कर ले जाते हैं किसी बेग साहब की अंग्रेजीं नाम वाली बहुत पुरानी किन्तु बेहतरीन हाउसबोट पर. वहां पहुँचते ही कश्मीर का मौसम अपना मिज़ाज रंगीन कर लेता है और शायद यही कारण है कि कश्मीर हमारे फिल्म जगत सबस प्रिय लोकेशन रही है.

यह अप्रैल का महिना है. यूँ तो हर मौसम में कश्मीर की अपनी अलग खूबसूरती है लेकिन अप्रैल से लेकर जून तक जब भारत के अधिकतर राज्य गर्मी से झुलस रहे होते हैं तो कश्मीर का मौसम अपने पूरे खुमार में होता है जिसका सर्वप्रथम स्वागत करते हैं ट्यूलिप के फूल जो कश्मीर की जमीन को प्यार के हर एक रंग से भर देते हैं.

ट्यूलिप की वादियों से अपनी आँखों को नया सा कर हम पहुँच जाते हैं शंकराचार्य की पहाड़ी पर. बादलों से ढकी इस पहाड़ी पर पहुँचते ही शंकराचार्य के मंदिर में पहुँचने के लिए आपको कुछ दो सौ सीडियां चढ़ कर दर्शन होते हैं एक विशाल शिवलिंग के. कहते हैं शंकराचार्य ने यहाँ अपनी तपस्या को सार्थक किया था. इस भव्य स्थल की तृप्त कर देने वाली शांति को निसंदेह आप अपने भीतर तक महसूस कर पाएंगे.

यहाँ से देखने पर डल झील में सजी अनके हाउसबोट और चल रहे शिकारे झील के जीवंत होने का प्रमाण देते हैं. हम दूर से अपनी हाउसबोट देखने का प्रयास करते हैं, पर ढूंढ नहीं पाते. यूँ तो इस शांति को छोड़ कर कहीं भी जाने का दिल नहीं चाहता किन्तु हम इसे अपने साथ ले जाने का तय कर फिर पहुँच जाते हैं शिकारे की सैर पर जो अद्भुत है, जहाँ नाविक के गीत की मीठी धुन घुल जाती है डल की हर एक लहर में. यहाँ पानी की सतह पर तैरते शिकारे देखना किसी ध्यान साधना से कम नहीं. डल झील पर आपको रोज़मर्रा के बाजार का भी अनुभव लेने को मिलेगा. शाम ढ़लती है झील की पलकों में और हम रात का सिरा पकडे पहुँच जाते हैं हाउसबोट पर जो भीतर से शाही अंदाज़ में सजी होती है. सर्द रात में खाने के बाद कुछ देर हाउसबोट के डेक पर बिताकर झील को आधुनिक रंगीनियो में देखने का आनंद उठा अपने कामे में जा कर सो जाते हैं.

सुबह उठते ही पहलगाम [पहलगाँव] की तयारी, जो श्रीनगर से तक़रीबन तिरानवे किलोमीटर है, लगभग तीन घंटों का हसीं सफ़र जो सूफी संगीत के साथ और भी हसीं लगता है. बर्फ से ढांके ऊँचे पहाड़, सड़क के एक किनारे पर बहती निरंतर नदी, बादलों के साथ इश्क लड़ते ऊँचे ऊँचे देओदर, पाइन और चिनार के पेड़ और सेब, केसर, बादाम और अखरोट के बगीचे अपनी खूबसूरती के आगे बेशकीमती वस्तुओं को भी मिट्टी बना दें.

पहल मतलब भेड-बकरी चराने वाले गुर्जर प्रजाति के लोग और उनका यह गाँव जहाँ पहुँचते ही एक होटल में चेक इन कर हम बिना समय गवाएं ढूढ़ लेते हैं घोड़े जो तय कीमत पर हमें बायसरन [मिनी स्विट्ज़रलैंड] अपने ऊपर बिठा कर ले जायेंगे. बादल, राजू और सिकंदर नाम के घोड़े निकल जाते हैं अपनी मदमस्त चाल में हमें उबड़ खाबड़ रस्ते से एक ऐसी जगह पहुँचाने जिसे आप प्रकृति का गलीचा कह सकते हैं.

मुझे लगता है कश्मीरियों को गलीच बनाने की प्रेरणा सदियों पहले इस जगह ने ही दी होगी. पूरे रस्ते रिमझिम बारिश के साथ सफ़र तय कर हम बायसरन पहुँचते हैं जहा मौसम की सबसे सुनहरी धुप हमारा इन्तेजार कर रही होती हैं. बर्फ के पहाड़ों के बीच बसी घाटी के चटख हरे गलीचे पर या तो निरंकुश भागने का दिल चाहता और फिर थक कर इसी की आगोश में बिन कुछ कहे घंटो लेट जाने का. मैंने दोनों ही किया. भूख लगने पर यहाँ आपको, चाय के साथ गर्म पकोड़े, कश्मीरी कहवा, नूडल्स, राजमा चावल जैसे खाद्य पदार्थ बहुत ही सुलभता से मिल जायेंगे. कुछ समय यहाँ गुजरने के बाद यहाँ से वापस लौट कर कुछ देर आराम कर हम निकल जाते हैं पहलगांव को और करीब से जानने के लिए वहां के लोगो से मिलने के लिए.

पूरे कश्मीर के लोगों में एक बात सामान्य रूप से देखने मिलती है उनके चेहरे की मुस्कराहट और उनकी मीठी बोली और मेजबानी कर  कश्मीरियों से अच्छा मेज़बान ढूँढना बहुत मुश्किल है.

सड़क के कनारे बह रही लिद्दर नदी की आवाज़ में खुद की आवाज़ को खो कर प्रकृति की भव्यता का भान हो जाता है. सुनहरी संध्या की सर्द लकीर पर चल कर होटल पहुंचकर कश्मीरी पुलाव का स्वाद लेते हैं. कश्मीरी भोजन में यूँ तो मांसाहारी जायकों की भरमार है पर शाकाहारी लोगो के लिए भी यहाँ खासे विकल्प उपलब्ध हैं. खड़े मसाले, सूखा मेवा और केसर किसी भी प्रकार के भोजन को जायके से भर देता है.

अगले दिन हम यहाँ की ही एक गाडी कर निकल जाते हैं घाटियों के कुछ और रंग देखने. जाहिद भाई [ड्राईवर और गाइड] से पता लगता है कि केवल पहलगांव में ही १५० दर्शनीय स्थल है. कुछ जगहों पर पहुचते हैं, आरू घटी, बेताब घटी और चन्दनवाड़ी, सबकी अपनी अलग ख़ूबसूरती. हम तस्वीरें खीचते हैं और अचानक कैमरा बंद करके रख देते है क्यूंकि कोई भी तस्वीर इस दृश्य जितनी खूबसूरत नहीं. ठगा सा महसूस होता है हर तस्वीर पर. पहलगाम में आप वाटर सपोर्ट का भी मज़ा ले सकते हैं. अपने जीवन में सहस के खेलों को स्थान देने वाले लोगों के लिए यह स्थान किसी वरदान से कम नहीं. अमरनाथ पहुँचने के लिए भी यहाँ से रास्ता है जो घुड़सवारी के जरिये पूरा किया जा सकता है.

अगले दिन गंदेरबल जिले में बसे सोने के मैदान कहलाने वाली तहसील सोनमर्ग की यात्रा प्रारंभ हुयी जो श्रीनगर से लगभग ५४ कि.मी. चलने पर पूरी हो गयी. सोनमर्ग में ही अमरनाथ यात्रा के लिए बेसकैंप की व्यवस्था है. यहाँ पहुँचने पर कुछ 20-२५ कि मी पर बालताल एवं जोज़िला पास हैं. जोज़िला पास को जीरो पॉइंट भी कहा जाता और यही अमरनाथ का पीछे का हिस्सा है. बालताल से कुछ ४ या ६ किलोमीटर चलने पर बाबा अमरनाथ के दर्शन हो जाते हैं. बर्फ के ऊँचे पहाड़ों के बीच से निकलती हुयी सिंध नदी बर्फ की श्वेत आभा लिए बहती है. ताज़ा बर्फ़बारी से ढंके बेदाग़ पहाड़ों पर लगे भोजपत्र के पेड़ भारत के तपस्वियों के ज्ञान की धरोहर को अपनी छाल में आज भी सहेज कर रखे हुए हैं. सोनमर्ग में ही थाजिवास ग्लेशियर को देखने का आनंद घुड़सवारी के ज़रिये उठाया जा सकता है. सोनमर्ग में आप स्लेज का भरपूर आनंद उठा सकते हैं.      

कश्मीर में अब हम श्रीनगर से लगभग ७२ कि मी दूर पहुँच जाते हैं बसे बारामुला जिले की गुलमर्ग तहसील में जिसके घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर अनेक रंग के फूल अपने आप खिल जाते हैं और यही देख कर सुल्तान युसूफ शाह ने इसका नाम गुलमर्ग रखा. गुलमर्ग विश्व के सबसे प्रसिद्द स्कींग स्थल है. यहाँ बर्फ से जुडा लगभग हर तरह का खेल खेला जाता है. बर्फ की मोटी चादर पर पहुँचने के लिए आपको गंडोला का सहारा लेना होता है जिसके लिए टिकट पहले से रोक लेने पर ऑनलाइन मिल जाते हैं. यहाँ भी आपको खाने पीने की सम्पूर्ण व्यवस्था मिल जाती है.

कश्मीर का ह्रदय उस पर जमी बर्फ की तरह स्वच्छ है. इस प्रेम और सौन्दर्य की धरती को ह्रदय के स्तर पर छोड़ पाना असंभव है. कश्मीर में रहकर आपको प्रकृति के सौन्दर्य का उत्कृष्ट रूप देखने मिलता है वह भी बिन किसी मिलावट के. यहाँ लकड़ी, कपडे, कालीन पेपर मेशी की कारीगरी के अद्भुत नमूने देखने मिलते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हैं. पर्यटन को कश्मीर का सबसे बड़ा व्यवसाय कहें को गलत नहीं होगा. प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में देशी और विदेशी लोग कश्मीर की वादियों में आपने आप को नया सा करने जाते हैं. यहाँ कुछेक तनाव की स्थितियां भी पैदा हो जाती है जो कुछ लोग अपने फायदे के लिए जान-बूझ पैदा करते है किन्तु उसके बाद भी पर्यटकों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता. कश्मीर बस इश्क के लिए है.