माँ

तुमको सुनकर के खोई में, और तुम्हे देख कर जी पाई,
कभी लगा तुम्हें मैं समझ गयी, और कभी कुछ भी न समझ पाई,
मैं कैसे कह दूँ क्या हो तुम और दिल के कितने पास हो तुम,
मेरे जीवन के हर एक पल में माँ सबसे ज्यादा ख़ास हो तुम,

जब तुमने लाखों दर्द सहे, तब इस दुनिया में मैं आई,
और मुझे देखकर बाहों में उस दर्द में भी तुम हर्षाई,
जो अन्जाने में मैंने ली जीवन की पहली सांस हो तुम,
मेरे जीवन के हर एक पल में माँ सबसे ज्यादा ख़ास हो तुम,

मैंने हर पल सब लोगों को रोने की भाषा समझाई,
जब कहा किसी ने मुझसे कुछ कभी खुद, कभी उन पर झुंझलाई,
जो सीखा मैंने हँसते हुए वोह सबसे पहला अलफ़ाज़ हो तुम,
मेरे जीवन के हर एक पल में माँ सबसे ज्यादा ख़ास हो तुम,

जब भाषा का कोई ज्ञान न था, तब सारी बातें कह पाई,
जब भाव कोई न था मन में यब तुझे देखकर मुस्काई,
न समझी में भी समझ सकी वोह एक लौता एहसाह हो तुम,
मेरे जीवन के हर एक पल में माँ सबसे ज्यादा ख़ास हो तुम,

जब खुद को भी मैं भूल गयी तब भी तुमको न भुला पाई,
जीवन की हर एक मुश्किल में बस तू ही याद सदा आई,
मेरे दर्द की आहों की वोह सबसे पहली आस हो तुम,
मेरे जीवन के हर एक पल में माँ सबसे ज्यादा ख़ास हो तुम,

जब सीखा जीवन में चलना तो, कई बार गिरी ठोकर खायी,
कभी खुद से ही मैं संभल गयी कभी गिरी रोई चोटें खायी,
जो टूट सका न एक पल भी एसा मेरा विश्वास हो तुम,
मेरे जीवन के हर एक पल में माँ सबसे ज्यादा ख़ास हो तुम,