निरंतर प्रेम

हे मनुज!

चंचल, चपल, चाटुकार, चालाक, चित्त से,
जिस, प्रेम, स्नेह, प्रीति की कामना है तुझे,
वह भटकाव, बिखराव, विघटन से प्राप्त नहीं,
उत्तेजना, उन्माद, उन्मत्तता से परे है,
वह असीम, अद्भुत, अथाह, अविरल, प्रेम,
जो निश्चित ही पवित्र, प्रचुर, परिपक्व, पूर्ण है,
और शुद्ध है पियूष, सुधा, अमृत की भांति,
जिसे किसी नाम, पहचान, परिचय, प्रमाण की आवशयकता नहीं,
जो स्वयं ही परिचायक है अविराम जीवन का,
जो व्यसन रहित और सशक्त है दिनकर की भांति,
जो पर्याय है, ऊर्जा, शक्ति, तेज, पराक्रम, प्रकाश का,
जिसमे समाये शोक, अवसाद, कोप, तिमिर, क्षुभ्ता,
वह अद्भुत, विलक्षण, असाधारण, प्रेम है आत्मा का आत्मा से,
वह कालजयी, निरंतर, प्रेम.