आप कतार में हैं

कतार व्यवस्था का प्रतीक है। मैंने जीवन में सबसे पहली कोई व्यवस्था सीखी, वह कतार थी जो मैंने स्कूल में प्रार्थना के लिए लगाई थी। छोटे से कस्बे का छोटा सा स्कूल था, जहाँ छोटी सी में उस कतार में सबसे पहले लगा करती थी। आगे लगने का एक कारण कुपोषण था और दूसरा कारण जब मेरा दाखिला होना था तब मेरी उम्र नर्सरी में पढ़ने की थी लेकिन उस कक्षा में दाखिले पूरे हो चुके थे अतः मेरे लिए वहाँ कोई स्थान न था। स्कूल की प्रिंसिपल ने मेरा इंटरव्यू लिया और मैंने उनके सवालों का सही जवाब दे दिया तो उन्होंने मुझे के-जी-वन में दाखिल दे दिया। अब मैं उम्र में भी अपनी कक्षा के बाकी विद्यार्थियों से छोटी हो गई अतः कतार में सबसे आगे। यह सिलसिला कई सालों तक यथावत रहा जिससे मैं पक्की हो गई अनुशासन झेलने में। कतार मुझसे शुरू होती थी, और मेरे कंधे से एक हाथ की दूरी पर मेरी पूरी कक्षा के रूप में चलती, जैसे मैं इंजन और बाकी सारे रेल के डब्बे। सबसे पहले मेरी यूनिफॉर्म, जूते और नाखून चेक होते, और यदि मुझमें कोई कमी होती तो शिक्षक का दिमाग मुझसे खराब होना प्रारंभ हो जाता, और मेरे साथ सभी की शामत आ जाती।

हमारे देश में जनसंख्या अधिक होने के कारण कतारें ठसाठस भरी होती, और यही कारण होता कि पुरुष और महिलाओं की कतारें अलग अलग होती, किन्तु महिलाओं के समानाधिकार की मांग के चलते उन्हें कुछ और मिला हो या न मिला हो कतार एक मिल गई। 

मैंने अपने जीवन में कई कतारें देखी हैं। एक बार मैं दूध लेने के लिए कतार में लगी थी। उस कस्बे में दो ही डेरी थीं। दूध कूपन से मिलता था और कूपन पैसों से। पैसे पिताजी की तनख्वाह से आते थे। पिता ईमानदार सरकारी नौकर थे, सो पैसे कम ही आते थे अतः थोड़े पैसों की बहुत कीमत थी। माँ दस बार हिदायत देती कि कूपन ध्यान से पकड़ना, तो खूब जोर की मुट्ठी बंद करके कागज़ का कूपन पकड़ लिया। दूध डेरी पर पहुँची तो लंबी कतार और उस कतार में उस समय आखरी मैं। स्कूल में सबसे पहले खड़े होने की आदत के कारण वह कतार अंतहीन जान पड़ती थी। कच्चे दूध, गोबर, और पसीने की गंध से यूँ मालूम होता था कि अब मैं उम्र भर कुछ सूंघ नहीं पाऊँगी। बहरहाल लाइन धीरे धीरे आगे बढ़ती गई, और कागज का कूपन मेरे हाथ के पसीने में धीरे धीरे गलता गया। जब मेरा नम्बर आया तब तक कूपन का गुलाबी रंग मेरे हाथ में लग चुका था और कूपन की लुगदी मेरे हाथ में चिपकी रह गई थी। उन्होंने दूध तोलने के लिए कूपन मांगा तो मैंने हाथ आगे बढ़ा दिया। दूध तौलने वाले चाचा जी बड़े भले आदमी थे सो उन्होंने पूछा कि कितने लीटर का कूपन था। मैंने झट से बता दिया कि एक लीटर का। उन्होंने इशारा किया कि उनके पैसे की बोरी पर मैं वह कूपन छूटा दूँ और मुझे हिदायत दी कि अगली बार सूखा कूपन लेकर आऊँ, जिसे मैंने सिर हिला कर सुन लिया और दूध लेकर घर आ गई।

रेल टिकिट की कतार तो असहनीय होती। मुझे लगता कि मैं जीवन में कभी कोई सफर न करूँ। एक बार मेरे बगल की रेल टिकिट की कतार में एक सज्जन खड़े खड़े बेहोश हो गए। बाकी लोग कतार से निकल कर उनकी मदद करने लगे सो उनके पीछे वाले लोग बड़ी ही तेज़ी टिकिट लेने के लिए आगे बढ़ गए। जब उन सज्जन को होश आया तो वे फिर कतार में लगे और इस बार सबसे पीछे।

कतारें भोजन की और राशन की दुखद होती हैं। तेजी से संक्रमित हो जाती हैं। थोड़ी सी गड़बड़ी से एक कतार में से दूसरी कतार निकल जाती है। एक छोटी से अफवाह से तीतर- बितर हो जाती हैं। ऐसी कतारें व्यवस्था बनाने के लिए मनुष्य को
समाप्त कर देती हैं।

आज का युग डिजिटल युग है। प्रत्यक्ष रूप से कतारों में खड़े होने से जिन्हें गुरेज है  वे डिजिटल जगत की अप्रत्यक्ष कतारों में खड़े हो जाते हैं। जिंदगी आसान हो गई है किंतु केवल उनके लिए जिन्हें इस आधुनिक जगत के उपयोग का महारथ हासील है।  डिजिटल जगत को अस्तित्व में लाने वाले मुखियाओं ने शायद ये सोचा होगा कि इस व्यवस्था से दूसरी व्यवस्थाओं के साथ कतारों की व्यवस्था में सुधार आ जायेगा। किन्तु  यह कतई सत्य नहीं है। जिन्हें असली नोट देखने मे सुख मिलता है वे डिजिटल पैसा देखकर आपने आपको असंतुष्ट महसूस करते हैं। कुछ लोग तो बैंकों में भी अपना भरोसा नहीं दिखा पाते। खासकर वे लोग जिनके पास धन बहुत कम है और कमाने के कोई खास साधन नहीं  और वे लोग भी जिनके पास धन अत्यधिक है और कमाने के अनंत साधन। ऐसे लोग अपना पैसा अपने हाथ में देखकर सुखी रहते हैं। इसी आदत के चलते वे बैंको एवं उनके डिजिटल जगत से जब तब कन्नी काटते दिखते हैं। हाल ही में मेरे एक सहकर्मी ने अपने सारे बीमे बंद करवाकर उसके पैसों से कार खरीद ली। उनका तर्क था कि महामारी का दौर है, सब साथ में मर रहे हैं। मैं पैसा किसी और के लिए क्यों छोड़ूँ सो सब खुद ही खत्म कर दूंगा। मरने के पहले अपनी पसंद की कार में घूमने का सुख तो प्राप्त होगा।

अतः कतारें डिजिटल जगत के बाद भी यथावत हैं। उनका अपना अस्तित्व है जो इतना सशक्त है कि वह कभी समाप्त नहीं हो सकता जैसे इस देश की गरीबी। जब तक यह वर्ग है कतारें लगती रहेंगी। कोविड के दौर में सरकार द्वारा खूब व्यवस्थाएँ बनाई गईं। पहले जाँच की, अस्पतालों की, भर्ती की, दवाओं की और अब टीकाकरण की। डिजिटल वर्ग को सब मिला लेकिन गरीब वर्ग फिर पीछे छूट गया कतारों में। एक टीकाकरण केंद्र पर पहुँची रही थी, तो उस केंद्र से वापस आती दो बुजुर्ग महिलाओं ने मुझे रोक लिया। यह बताते हुए पूछा कि टीके की- “पहली खुराक लग गई, दूसरी कैसे लगेगी?” मैंने कहा-“जैसी पहले लगी थी।”
वे बोली- “नहीं लग रही, हम सुबह से पैदल चल कर आये और कतार में तीन घंटे लगे रहे, लेकिन उन्होंने लौटा दिया बोला मोबाइल से आओ।”
पहले में समझी नहीं, फिर समझ आया कि अपॉइंटमेंट लेकर आना होगा, सो मैंने पूछ लिया-“आपने नहीं लिया अपॉइंटमेंट?”
वे बोली- “क्या होता है ये?”
मैंने कहा- “मोबाईल में लेना है ऐप्प से!”
वे बोली-“किससे लेना होता है?”
मैंने कुछ नहीं कहा!
वे फिर बोली -“आप हमारी मदद कीजिये हमें टीका लगवा दीजिये।”
मैंने कहा -“आपके बच्चे होंगे, वे जानते होंगे।”
वे बोली-“आज कल के बच्चे कहाँ सुनते हैं हमारी, और उनके पास भी मोबाइल नहीं, पड़ोसी के पास है, लेकिन उसने किसी को नंबर देने से मना किया है।”
वे गिड़गिड़ाने लगीं। मुझे दया आ गई। मैं सेंटर पर पूछताछ करने चली गई।
एक सज्जन मिले, बोले “हम आदेशनुसार काम करते हैं। हमारे हाथ में कुछ नहीं।”
मैंने पूछा-“कोई तो उपाय होगा?”
वे बोले- “शाम तक रुकें यदि टीका बच गया तो लग जायेगा।”
मैंने उन महिलाओं से जस का तस कह दिया। उन्होंने पूछा कि “यदि बचता हो तो रुक जाएंगे।”
जवाब था कोई निश्चित नहीं, सब आज की स्थिति पर निर्भर करता है।
वे फिर गिड़गिड़ाने लगीं, बोलीं टीका लगना जरूरी है नहीं तो राशन कार्ड बंद हो जाएगा। अब तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न था। वे महामारी से बचने के लिए टिका नहीं लगवा रहीं। उनकी राशन की व्यवस्था का सवाल था।

खैर! उन्हें यह समझा कर घर भेज दिया गया कि वे शाम को पुनः आ कर देख लें। उन सज्जन पुरुष ने अपना फ़ोन नंबर भी दे दिया। वे वापस लौट गई और मैं भी।

वे फिर लौटेंगी कतार में लगने के लिए।