ज़माने की उलझनों से दूर होने को चलो किसी मेले में कहीं खो जाते हैं।

स्त्री

न जाने कितनी बार,
ढूंढ कर लाई जाती है वह,
और पहुँचाई जाती है,
घर तक।

उसे बाहर निकलने की अनुमति नहीं,
घर से,
किन्तु वह अपने कमरे की खिड़की से
देखती है देर तक,
दूर तक,
रचती है कई सहेलियाँ,
अपनी भावनाओं की।
जिनके साथ साझा करती है
वह अपने दुःख का सुख।
अपने जागते सपनों में से
चुने हुए
सबसे उम्दा स्वप्न से
वह बुन लेती है अपना प्रेम।