आप की तारीफ

नमस्कार!
बहुत प्रसन्नता हुई आपसे मिलकर। क्या मैं जान सकता हूँ आपका शुभ नाम?
जी क्या करेंगे आप नाम जानकर?
कुछ खास नहीं, बस नाम जान लेने से एक पहचान का बोध हो आता है।
पहचान तो स्वयं मिथ्या है। आप जान लीजिए कि मैं जो हूँ, जो दिखता हूँ दरसल मैं वो हूँ ही नहीं, और जो मैं हूँ वो मैं बन ही नहीं पा रहा।
ह्म्म्म!
क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आप क्यों वह नहीं बन पा रहे जो आप हैं?
यह एक सही सवाल हो सकता है अगर मैं इसका जवाब सही दे सका तो! बात यह है कि इस नाम के चक्कर में ही फस कर रह गया हूँ। अब गुमनाम हो जाना चाहता हूँ।
परंतु जो पहले ही आपका नाम जानते हैं उनका क्या?
जब वे मुझे मुझसा जान जाएंगे तो मेरा यह नाम उनके लिए बेमानी हो जाएगा।
आपकी बातों से उदासीनता की महक आ रही है। भला जिस नाम के लिए सारी दुनिया इतने जतन कर रही है आप उसे ही छोड़ देना चाहते हैं। लगता है आपने इस नाम के चक्कर में कोई गहरी ठोकर खाई है।
कह सकते हैं आप ऐसा भी। किन्तु शेक्सपियर के what’s there in name ने मुझ पर इस गहराई से चोट की कि मैं नाम की माया से बाहर निकल आया।
तो क्या अब आप नाम नहीं कमाएंगे?
जब माँ पिताजी ने नाम रखा था तो प्रेम-वश रखा, स्कूल पहुँचते ही नाम वह सीरियल नंबर बन गया जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं था कक्षा की मोटाई कम अधिक होती तो वह नंबर भी अपनी जगह से हिल जाता। कॉलेज पहुंचने पर वही नाम नोटिस बोर्ड का हिस्सा बन गया जो हर लापरवाही में सबसे ऊपर लिखा जाने लगा चाहे वह अनुपस्थिति हो या अनुत्तीर्ण हो।
तब यह विचार आया कि इस प्रकार की व्यवस्था से किसी को भी क्या हासिल है। क्यों ये नोटिस बोर्ड हमेशा नकारात्मकता का हिस्सा बनता है और यदि बने भी तो मुझे क्यों इसका हिस्सा बनाया जाता है। हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में क्यों ऐसी व्यवस्था नहीं जहाँ कोई अपनी रुचि के अनुसार शिक्षा ग्रहण कर सके। क्यों मैं शेक्सपियर, चेखव, रिल्के, पढ़ कर समाज में अपनी हिस्सेदारी नहीं दे सकता। क्यों वे हमें यंत्री के स्थान पर यंत्र और चिकित्सक के स्थान पर संवेदना हीन बूत एवं ऐसे ही अनेक उदाहरण बना कर छोड़ देना चाहते हैं केवल नाम कमाने को। बस उस समय से ही नाम से मोह भंग हो गया।
तब आप क्या चाहते हैं?
मैं कुछ भी चाहना नहीं चाहता हूँ।
तब तो आपका जीवन व्यर्थ है। बिन चाह के आपको कोई राह कैसे मिले।
है तो चाह कुछ भी न चाहने की। किन्तु अब इसे भी समाप्त कर रहा हूँ।
जब कोई चाह ही न होगी तो क्या रह जायेगा आपके जीवन में। बिन नाम और चाह के तो आप जीते हुए भी मृत हो जाएंगे।
तो क्या आप नाम और चाह के साथ पूर्ण रूप से जीवित है?
जी हाँ, मेरी इच्छाएँ ही मुझे जीवित रखती हैं।
जी अवश्य और दुखी भी।
परंतु यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ?
आप जीवित हैं या नहीं?
आपको क्या लगता है?
मुझे तो संदेह है। मैं आप को जीवित मानने को तैयार नहीं।
फिर तो आपको बहुत रोमांच होगा एक मृत मनुष्य से आमने सामने बात करने पर।
कोई रोमांच नहीं मुझे, हाँ आश्चर्य अवश्य है कि आप जीते जी मृत हो जाना चाहते हैं।
नहीं मैं जीते जी मृत नहीं हुआ। मेरा नाम हटाकर आज आपने मुझ मृत आत्मा से जीवन्त बात की। यह यो मेरी मृत्यु पर विजय हुई। और यही प्राप्त करने तो मैं निकला था नाम तक छोड़ कर।