अफवाहें

शहर के बीचों बीच के
चौराहे के चबूतरे पर बैठे चार दोस्त,
चोंच से चोंच मिलाकर,
आपस में बतिया रहे थे।
कोई इक बात थी जिसे,
किसी को न कहना था,
उसी के चटखारे लगा रहे थे,
उनका मकसद था उस बात को आग की तरह फैलाना।
पर हर थोड़ी देर में कहते,
तुम्हें कह रहा हूँ किसी और को न बताना।
उनमे से किसी एक ने किसी और को,
उस बात के बारे में बात करते, बस दूर से सुना था,
कुछ ही शब्द कान में आये थे,
बाकी का मसला जनाब ने खुद ही बुना था।
तीन तेरह में कई बार फस चुके थे,
कइयों बार पिटने से बच चुके थे,
पर हमेशा तन कर चलते थे,
कभी कोई मलाल न करते थे,
क्योंकि महारथ हासिल था,
अफवाहों के बाजार में,
बातों के व्यपार में,
न जाने,
कितनों को तबाह कर चुके थे,
कितने ही घर निगल चुके थे,
और ये पनपे कुकुरमुत्ते की भांति,
ना कोई धर्म ना ही कोई जाती,
कहीं पर भी ऊगे हैं,
कितने भी फैले है,
बातों के भूखे हैं,
अंदर से मैले है,
पर फिर भी चल पड़े है,
मजबूती से खड़े है,
क्योंकि कमजोर हैं हम,
और अफवाहों का बाजार है गरम।