अद्भुत एलोरा

महाराष्ट्र केऔरंगाबाद जिले में चौड़ी सड़क के एक तरफ एक बड़े से गेट के बहार पीले रंग के बोर्ड पर लिखा हुआ है “एलोरा केव्स” अर्थात- “एलोरा की गुफाएं”। उस बोर्ड पर एलोरा की गुफाओं का मानचित्र भी दर्शाया गया है। सातवी और नौवीं शताब्दी में निर्मित ये गुफाएं भारतीय संस्कृति मैं हिन्दू, जैन, और बौद्ध धर्म के इतिहास का मिश्रण है ये विश्व प्रसिद्ध गुफाएं। 

एलोरा में कुल 33 गुफाएं है और सभी गुफाओं का अपना अपना महत्व है। गुफा क्रमांक 1 से 12 तक बौद्ध धर्म की परिचायक है। हिन्दू संस्कृति मैं ब्राह्मण धर्म का परिचय  हमें गुफा 13 से 29 तक की सोलह गुफाओं से मिलता है और 30 से 34 तक की गुफाएं हमें जैन धर्म का इतिहास बतातीं हैं। बीस रुपये की पार्किंग टिकिट और दस रुपए की प्रवेश टिकिट खरीदने के बाद आप पहुँच जाते हैं एक ऐसी अद्भुत दुनियाँ में जिसकी अपने स्वप्न मैं भी कल्पना नहीं की होगी।

मुख्य गेट से अंदर आते ही गुफा क्रमांक 16 का मुख्य द्वार दिखाई पड़ता है। उस द्वार के अंदर जाने से पहले ही कई ऑटो वाले एवं गाइड आपको गुफा दिखने के लिए प्रस्ताव देते मिल जाते है। मैंने भी गुफा के बारे मैं जानकारी लेने के लिए उसके इतिहास से जुडी एक किताब खरीद ली जिससे मुझे उस गुफा के बारे में मूलभूत जानकारी मिल गयी और फिर बचपन मैं पढ़ा हुआ इतिहास भी खूब काम आया। पर यदि आपको इतिहास की किताब पढ़ने मैं कोई विशेष रूचि न हो तो आप गाइड की मदद अवश्य लें।इस गुफा के भव्य प्रवेश द्वार पर पाषाण पर उकेरी गयी कारीगरी का अविस्मरणीय नमूना आपको रोमांचित कर देता है।


उस प्रवेश द्वार के अंदर जाते ही आप पहुँच जाते हैं उस युग मैं जिसे आपने किस्से कहानियों में सुना होगा। हमारी कल्पना से परे  शिव -पार्वती और गजराज की विशाल कायिक मूर्तियां एवं विशाल ध्वजस्थम्भ आपको उस काल के जीवंत होने का परिचय देता हैं।


पाषाण पर उकेरी गयी छोटी से छोटी कारीगरी यह सिद्ध करती है की निश्चित ही हम एक अत्यंत रचनात्मक इतिहास का उत्तरदायित्व कर रहे है। कला प्रेमियों के लिए इस जगह को उनका आदर्श कहे तो गलत न होगा। सैकड़ों लोगों की भीड़ के बाद भी इन गुफाओं में आप मन के भीतर अतुल्य शांति का अनुभव कर सकते हैं।

शिव पार्वती की छवि को देख कर संस्कृत के श्लोक स्वतः ही आपके कानो में गूंजने लग जाते है इसी तरह भगवान् बुद्ध के दर्शन से बुद्धम् शरणम् गच्छामि का मन्त्र आपके मन को पवित्रता के और करीब ले जाता है और जैन धर्म के पर्याय भगवान् बाहुबली की प्रतिमा को निहारकर मन में त्याग और अहिंसा का भाव जाग उठता है।


भारतीय संस्कृति की सम्पन्नता को दर्शाती ये गुफाएं निश्चित रूप से छुट्टियों में भ्रमण के लिए एक बहुत ही उम्दा विकल्प है।

उदयगिरि की गुफाएँ

उदयगिरि का अर्थ है सूर्योदय का पहाड़, मध्य प्रदेश के विदिशा के पास बीस रॉक-कट गुफाओं का एक ऐतिहासिक स्थल।

उदयगिरि गुफाएं भारत की कुछ सबसे प्राचीन हिंदू छवियों और गुफाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये गुफाएँ गुप्त काल के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल हैं। यहाँ चंद्रगुप्त द्वितीय (सी। 375-415) और कुमारगुप्त के शासनकाल से संबंधित गुप्त वंश के महत्वपूर्ण शिलालेख हैं। यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत संरक्षित है।

इन गुफाओं तक पहुंचना बहुत सरल है। भोपाल से 57 किलोमीटर दूर इन गुफाओं तक आप गाड़ी के सहारे एक घंटे में यहाँ पहुँच सकते हैं। यहाँ पहुँच कर आपको न केवल आध्यात्मिक सुख का अनुभव होगा अपितु आप स्वयं को गुप्त काल के बहुत समीप पाएंगे। आपको महसूस होगा कि इन ऐतिहासिक इमारतों से होकर आप उस शांति तक पहुँच सकते हैं जहाँ स्वयं भगवान का वास होता है।

उदयगिरि गुफा परिसर में कुल बीस गुफाएं हैं, जिनमें से एक जैन धर्म को और अन्य सभी हिंदू धर्म को समर्पित है। पाषाण पर की गई नक्कासी से निर्मित ये गुफाएँ साक्षी हैं मनुष्य के कला और भक्ति के प्रति समर्पण की।

उदयगिरि की गुफाओं में वैष्णववाद (विष्णु), शक्तिवाद (दुर्गा और मातृका) और शैववाद (शिव) की प्रतिमाएं हैं। ये गुफाएँ हिंदुओं की लोकप्रिय पौराणिक कथाओं का चित्रण करती है।

इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो उदयगिरि और विदिशा का क्षेत्र दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक बौद्ध और भागवत स्थल था, जैसा कि सांची के स्तूपों और हेलियोडोरस स्तंभ से प्रमाणित होता है।

जैन गुफा ४२५ सीई से सबसे पुराने ज्ञात जैन शिलालेखों में से एक के लिए उल्लेखनीय है, जबकि हिंदू गुफाओं में ४०१ सीई से शिलालेख हैं।

यूँ तो उदयगिरि आने के लिए कोई भी मौसम अच्छा है किन्तु आप गर्मियों में यहाँ दोपहर नहीं बिता पाएंगे। आपकी कला, इतिहास और अध्यात्म में रुचि है तो यह स्थान आपकी यात्रा के लिए सर्वोत्तम है किंतु यदि आपकी रुचि नहीं भी है तो भी इस जगह को इसकी खूबसूरती के लिए आप बहुत पसंद करेंगे। खाने पीने के लिए एमपीटी का रिसोर्ट है साँची में। तो जब भी भोपाल आएं साँची के साथ उदयगिरि का भी आंनद उठाएं।

इश्क-ए-कश्मीर

बचपन में जब आप अपनी माँ के आँचल में छुप कर, परियों की कहानी सुन कर सोते हैं और मीठी नींद के किसी ख्वाब में एक ऐसी खूबसूरत जगह पहुँच जाते हैं जो आपके मन के अनुरूप हर क्षण बदलती है और हर बार आपको अपनी खूबसूरती से एक अद्भुत आश्चर्य से भर देती है, ऐसी अद्भुत स्वप्निल सौन्दर्य की धरा का नाम है कश्मीर जो भारत के राज्य जम्मू कश्मीर का हिस्सा है.

श्रीनगर, जम्मू- कश्मीर की राजधानी के हृदय की हलचल आप डल झील के रूप में महसूस कर सकते है. यह झील दर्पण है पूरे श्रीनगर का और यह दर्पण श्रीनगर को उसकी ख़ूबसूरती का निरंतर अहसास करता रहा है फिर चाहे इसके शाक्षी भगवान् बुद्ध हों या कश्मीर शैव दर्शन के प्रणेता आचार्य वासुगुप्त, मुग़ल सल्तनत के सुल्तान मीर शाह और उनकी पीढ़ियाँ हों या महाराजा रणजीत सिंह की रियासत. सभी ने इस सौंदर्य को ह्रदय से सराहा और इसका संरक्षण किया. श्रीनगर तक पहुँचने के लिए आपको जम्मू से बस, टैक्सी या हवाई जहाज की सुविधा ले सकते हैं. मैं यहाँ दिल्ली से हवाई यात्रा करके पहुँची. पहुँचते ही यहाँ कोई याकूब भाई आपको लेने तख्ती पर आपका नाम लिए मुस्कराहट के साथ खड़े आपका इंतज़ार कर रहे होते हैं. उनके साथ गाड़ी में बैठ कर हम पहुँच जाते है डल झील के किनारे पर जहाँ आखों के लिए झील की खूबसूरती किसी चमकते हीरों के ढेर की तरह दिखयी देती है, जिसकी न तो कभी इन आँखों ने कल्पना की थी और न ही कोई तैयारी.

गाड़ी रूकती है और सामने कोई वसीम भाई शिकारे पर बिठा कर ले जाते हैं किसी बेग साहब की अंग्रेजीं नाम वाली बहुत पुरानी किन्तु बेहतरीन हाउसबोट पर. वहां पहुँचते ही कश्मीर का मौसम अपना मिज़ाज रंगीन कर लेता है और शायद यही कारण है कि कश्मीर हमारे फिल्म जगत सबस प्रिय लोकेशन रही है.

यह अप्रैल का महिना है. यूँ तो हर मौसम में कश्मीर की अपनी अलग खूबसूरती है लेकिन अप्रैल से लेकर जून तक जब भारत के अधिकतर राज्य गर्मी से झुलस रहे होते हैं तो कश्मीर का मौसम अपने पूरे खुमार में होता है जिसका सर्वप्रथम स्वागत करते हैं ट्यूलिप के फूल जो कश्मीर की जमीन को प्यार के हर एक रंग से भर देते हैं.

ट्यूलिप की वादियों से अपनी आँखों को नया सा कर हम पहुँच जाते हैं शंकराचार्य की पहाड़ी पर. बादलों से ढकी इस पहाड़ी पर पहुँचते ही शंकराचार्य के मंदिर में पहुँचने के लिए आपको कुछ दो सौ सीडियां चढ़ कर दर्शन होते हैं एक विशाल शिवलिंग के. कहते हैं शंकराचार्य ने यहाँ अपनी तपस्या को सार्थक किया था. इस भव्य स्थल की तृप्त कर देने वाली शांति को निसंदेह आप अपने भीतर तक महसूस कर पाएंगे.

यहाँ से देखने पर डल झील में सजी अनके हाउसबोट और चल रहे शिकारे झील के जीवंत होने का प्रमाण देते हैं. हम दूर से अपनी हाउसबोट देखने का प्रयास करते हैं, पर ढूंढ नहीं पाते. यूँ तो इस शांति को छोड़ कर कहीं भी जाने का दिल नहीं चाहता किन्तु हम इसे अपने साथ ले जाने का तय कर फिर पहुँच जाते हैं शिकारे की सैर पर जो अद्भुत है, जहाँ नाविक के गीत की मीठी धुन घुल जाती है डल की हर एक लहर में. यहाँ पानी की सतह पर तैरते शिकारे देखना किसी ध्यान साधना से कम नहीं. डल झील पर आपको रोज़मर्रा के बाजार का भी अनुभव लेने को मिलेगा. शाम ढ़लती है झील की पलकों में और हम रात का सिरा पकडे पहुँच जाते हैं हाउसबोट पर जो भीतर से शाही अंदाज़ में सजी होती है. सर्द रात में खाने के बाद कुछ देर हाउसबोट के डेक पर बिताकर झील को आधुनिक रंगीनियो में देखने का आनंद उठा अपने कामे में जा कर सो जाते हैं.

सुबह उठते ही पहलगाम [पहलगाँव] की तयारी, जो श्रीनगर से तक़रीबन तिरानवे किलोमीटर है, लगभग तीन घंटों का हसीं सफ़र जो सूफी संगीत के साथ और भी हसीं लगता है. बर्फ से ढांके ऊँचे पहाड़, सड़क के एक किनारे पर बहती निरंतर नदी, बादलों के साथ इश्क लड़ते ऊँचे ऊँचे देओदर, पाइन और चिनार के पेड़ और सेब, केसर, बादाम और अखरोट के बगीचे अपनी खूबसूरती के आगे बेशकीमती वस्तुओं को भी मिट्टी बना दें.

पहल मतलब भेड-बकरी चराने वाले गुर्जर प्रजाति के लोग और उनका यह गाँव जहाँ पहुँचते ही एक होटल में चेक इन कर हम बिना समय गवाएं ढूढ़ लेते हैं घोड़े जो तय कीमत पर हमें बायसरन [मिनी स्विट्ज़रलैंड] अपने ऊपर बिठा कर ले जायेंगे. बादल, राजू और सिकंदर नाम के घोड़े निकल जाते हैं अपनी मदमस्त चाल में हमें उबड़ खाबड़ रस्ते से एक ऐसी जगह पहुँचाने जिसे आप प्रकृति का गलीचा कह सकते हैं.

मुझे लगता है कश्मीरियों को गलीच बनाने की प्रेरणा सदियों पहले इस जगह ने ही दी होगी. पूरे रस्ते रिमझिम बारिश के साथ सफ़र तय कर हम बायसरन पहुँचते हैं जहा मौसम की सबसे सुनहरी धुप हमारा इन्तेजार कर रही होती हैं. बर्फ के पहाड़ों के बीच बसी घाटी के चटख हरे गलीचे पर या तो निरंकुश भागने का दिल चाहता और फिर थक कर इसी की आगोश में बिन कुछ कहे घंटो लेट जाने का. मैंने दोनों ही किया. भूख लगने पर यहाँ आपको, चाय के साथ गर्म पकोड़े, कश्मीरी कहवा, नूडल्स, राजमा चावल जैसे खाद्य पदार्थ बहुत ही सुलभता से मिल जायेंगे. कुछ समय यहाँ गुजरने के बाद यहाँ से वापस लौट कर कुछ देर आराम कर हम निकल जाते हैं पहलगांव को और करीब से जानने के लिए वहां के लोगो से मिलने के लिए.

पूरे कश्मीर के लोगों में एक बात सामान्य रूप से देखने मिलती है उनके चेहरे की मुस्कराहट और उनकी मीठी बोली और मेजबानी कर  कश्मीरियों से अच्छा मेज़बान ढूँढना बहुत मुश्किल है.

सड़क के कनारे बह रही लिद्दर नदी की आवाज़ में खुद की आवाज़ को खो कर प्रकृति की भव्यता का भान हो जाता है. सुनहरी संध्या की सर्द लकीर पर चल कर होटल पहुंचकर कश्मीरी पुलाव का स्वाद लेते हैं. कश्मीरी भोजन में यूँ तो मांसाहारी जायकों की भरमार है पर शाकाहारी लोगो के लिए भी यहाँ खासे विकल्प उपलब्ध हैं. खड़े मसाले, सूखा मेवा और केसर किसी भी प्रकार के भोजन को जायके से भर देता है.

अगले दिन हम यहाँ की ही एक गाडी कर निकल जाते हैं घाटियों के कुछ और रंग देखने. जाहिद भाई [ड्राईवर और गाइड] से पता लगता है कि केवल पहलगांव में ही १५० दर्शनीय स्थल है. कुछ जगहों पर पहुचते हैं, आरू घटी, बेताब घटी और चन्दनवाड़ी, सबकी अपनी अलग ख़ूबसूरती. हम तस्वीरें खीचते हैं और अचानक कैमरा बंद करके रख देते है क्यूंकि कोई भी तस्वीर इस दृश्य जितनी खूबसूरत नहीं. ठगा सा महसूस होता है हर तस्वीर पर. पहलगाम में आप वाटर सपोर्ट का भी मज़ा ले सकते हैं. अपने जीवन में सहस के खेलों को स्थान देने वाले लोगों के लिए यह स्थान किसी वरदान से कम नहीं. अमरनाथ पहुँचने के लिए भी यहाँ से रास्ता है जो घुड़सवारी के जरिये पूरा किया जा सकता है.

अगले दिन गंदेरबल जिले में बसे सोने के मैदान कहलाने वाली तहसील सोनमर्ग की यात्रा प्रारंभ हुयी जो श्रीनगर से लगभग ५४ कि.मी. चलने पर पूरी हो गयी. सोनमर्ग में ही अमरनाथ यात्रा के लिए बेसकैंप की व्यवस्था है. यहाँ पहुँचने पर कुछ 20-२५ कि मी पर बालताल एवं जोज़िला पास हैं. जोज़िला पास को जीरो पॉइंट भी कहा जाता और यही अमरनाथ का पीछे का हिस्सा है. बालताल से कुछ ४ या ६ किलोमीटर चलने पर बाबा अमरनाथ के दर्शन हो जाते हैं. बर्फ के ऊँचे पहाड़ों के बीच से निकलती हुयी सिंध नदी बर्फ की श्वेत आभा लिए बहती है. ताज़ा बर्फ़बारी से ढंके बेदाग़ पहाड़ों पर लगे भोजपत्र के पेड़ भारत के तपस्वियों के ज्ञान की धरोहर को अपनी छाल में आज भी सहेज कर रखे हुए हैं. सोनमर्ग में ही थाजिवास ग्लेशियर को देखने का आनंद घुड़सवारी के ज़रिये उठाया जा सकता है. सोनमर्ग में आप स्लेज का भरपूर आनंद उठा सकते हैं.      

कश्मीर में अब हम श्रीनगर से लगभग ७२ कि मी दूर पहुँच जाते हैं बसे बारामुला जिले की गुलमर्ग तहसील में जिसके घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर अनेक रंग के फूल अपने आप खिल जाते हैं और यही देख कर सुल्तान युसूफ शाह ने इसका नाम गुलमर्ग रखा. गुलमर्ग विश्व के सबसे प्रसिद्द स्कींग स्थल है. यहाँ बर्फ से जुडा लगभग हर तरह का खेल खेला जाता है. बर्फ की मोटी चादर पर पहुँचने के लिए आपको गंडोला का सहारा लेना होता है जिसके लिए टिकट पहले से रोक लेने पर ऑनलाइन मिल जाते हैं. यहाँ भी आपको खाने पीने की सम्पूर्ण व्यवस्था मिल जाती है.

कश्मीर का ह्रदय उस पर जमी बर्फ की तरह स्वच्छ है. इस प्रेम और सौन्दर्य की धरती को ह्रदय के स्तर पर छोड़ पाना असंभव है. कश्मीर में रहकर आपको प्रकृति के सौन्दर्य का उत्कृष्ट रूप देखने मिलता है वह भी बिन किसी मिलावट के. यहाँ लकड़ी, कपडे, कालीन पेपर मेशी की कारीगरी के अद्भुत नमूने देखने मिलते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हैं. पर्यटन को कश्मीर का सबसे बड़ा व्यवसाय कहें को गलत नहीं होगा. प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में देशी और विदेशी लोग कश्मीर की वादियों में आपने आप को नया सा करने जाते हैं. यहाँ कुछेक तनाव की स्थितियां भी पैदा हो जाती है जो कुछ लोग अपने फायदे के लिए जान-बूझ पैदा करते है किन्तु उसके बाद भी पर्यटकों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता. कश्मीर बस इश्क के लिए है.