आप कतार में हैं

कतार व्यवस्था का प्रतीक है। मैंने जीवन में सबसे पहली कोई व्यवस्था सीखी, वह कतार थी जो मैंने स्कूल में प्रार्थना के लिए लगाई थी। छोटे से कस्बे का छोटा सा स्कूल था, जहाँ छोटी सी में उस कतार में सबसे पहले लगा करती थी। आगे लगने का एक कारण कुपोषण था और दूसरा कारण जब मेरा दाखिला होना था तब मेरी उम्र नर्सरी में पढ़ने की थी लेकिन उस कक्षा में दाखिले पूरे हो चुके थे अतः मेरे लिए वहाँ कोई स्थान न था। स्कूल की प्रिंसिपल ने मेरा इंटरव्यू लिया और मैंने उनके सवालों का सही जवाब दे दिया तो उन्होंने मुझे के-जी-वन में दाखिल दे दिया। अब मैं उम्र में भी अपनी कक्षा के बाकी विद्यार्थियों से छोटी हो गई अतः कतार में सबसे आगे। यह सिलसिला कई सालों तक यथावत रहा जिससे मैं पक्की हो गई अनुशासन झेलने में। कतार मुझसे शुरू होती थी, और मेरे कंधे से एक हाथ की दूरी पर मेरी पूरी कक्षा के रूप में चलती, जैसे मैं इंजन और बाकी सारे रेल के डब्बे। सबसे पहले मेरी यूनिफॉर्म, जूते और नाखून चेक होते, और यदि मुझमें कोई कमी होती तो शिक्षक का दिमाग मुझसे खराब होना प्रारंभ हो जाता, और मेरे साथ सभी की शामत आ जाती।

हमारे देश में जनसंख्या अधिक होने के कारण कतारें ठसाठस भरी होती, और यही कारण होता कि पुरुष और महिलाओं की कतारें अलग अलग होती, किन्तु महिलाओं के समानाधिकार की मांग के चलते उन्हें कुछ और मिला हो या न मिला हो कतार एक मिल गई। 

मैंने अपने जीवन में कई कतारें देखी हैं। एक बार मैं दूध लेने के लिए कतार में लगी थी। उस कस्बे में दो ही डेरी थीं। दूध कूपन से मिलता था और कूपन पैसों से। पैसे पिताजी की तनख्वाह से आते थे। पिता ईमानदार सरकारी नौकर थे, सो पैसे कम ही आते थे अतः थोड़े पैसों की बहुत कीमत थी। माँ दस बार हिदायत देती कि कूपन ध्यान से पकड़ना, तो खूब जोर की मुट्ठी बंद करके कागज़ का कूपन पकड़ लिया। दूध डेरी पर पहुँची तो लंबी कतार और उस कतार में उस समय आखरी मैं। स्कूल में सबसे पहले खड़े होने की आदत के कारण वह कतार अंतहीन जान पड़ती थी। कच्चे दूध, गोबर, और पसीने की गंध से यूँ मालूम होता था कि अब मैं उम्र भर कुछ सूंघ नहीं पाऊँगी। बहरहाल लाइन धीरे धीरे आगे बढ़ती गई, और कागज का कूपन मेरे हाथ के पसीने में धीरे धीरे गलता गया। जब मेरा नम्बर आया तब तक कूपन का गुलाबी रंग मेरे हाथ में लग चुका था और कूपन की लुगदी मेरे हाथ में चिपकी रह गई थी। उन्होंने दूध तोलने के लिए कूपन मांगा तो मैंने हाथ आगे बढ़ा दिया। दूध तौलने वाले चाचा जी बड़े भले आदमी थे सो उन्होंने पूछा कि कितने लीटर का कूपन था। मैंने झट से बता दिया कि एक लीटर का। उन्होंने इशारा किया कि उनके पैसे की बोरी पर मैं वह कूपन छूटा दूँ और मुझे हिदायत दी कि अगली बार सूखा कूपन लेकर आऊँ, जिसे मैंने सिर हिला कर सुन लिया और दूध लेकर घर आ गई।

रेल टिकिट की कतार तो असहनीय होती। मुझे लगता कि मैं जीवन में कभी कोई सफर न करूँ। एक बार मेरे बगल की रेल टिकिट की कतार में एक सज्जन खड़े खड़े बेहोश हो गए। बाकी लोग कतार से निकल कर उनकी मदद करने लगे सो उनके पीछे वाले लोग बड़ी ही तेज़ी टिकिट लेने के लिए आगे बढ़ गए। जब उन सज्जन को होश आया तो वे फिर कतार में लगे और इस बार सबसे पीछे।

कतारें भोजन की और राशन की दुखद होती हैं। तेजी से संक्रमित हो जाती हैं। थोड़ी सी गड़बड़ी से एक कतार में से दूसरी कतार निकल जाती है। एक छोटी से अफवाह से तीतर- बितर हो जाती हैं। ऐसी कतारें व्यवस्था बनाने के लिए मनुष्य को
समाप्त कर देती हैं।

आज का युग डिजिटल युग है। प्रत्यक्ष रूप से कतारों में खड़े होने से जिन्हें गुरेज है  वे डिजिटल जगत की अप्रत्यक्ष कतारों में खड़े हो जाते हैं। जिंदगी आसान हो गई है किंतु केवल उनके लिए जिन्हें इस आधुनिक जगत के उपयोग का महारथ हासील है।  डिजिटल जगत को अस्तित्व में लाने वाले मुखियाओं ने शायद ये सोचा होगा कि इस व्यवस्था से दूसरी व्यवस्थाओं के साथ कतारों की व्यवस्था में सुधार आ जायेगा। किन्तु  यह कतई सत्य नहीं है। जिन्हें असली नोट देखने मे सुख मिलता है वे डिजिटल पैसा देखकर आपने आपको असंतुष्ट महसूस करते हैं। कुछ लोग तो बैंकों में भी अपना भरोसा नहीं दिखा पाते। खासकर वे लोग जिनके पास धन बहुत कम है और कमाने के कोई खास साधन नहीं  और वे लोग भी जिनके पास धन अत्यधिक है और कमाने के अनंत साधन। ऐसे लोग अपना पैसा अपने हाथ में देखकर सुखी रहते हैं। इसी आदत के चलते वे बैंको एवं उनके डिजिटल जगत से जब तब कन्नी काटते दिखते हैं। हाल ही में मेरे एक सहकर्मी ने अपने सारे बीमे बंद करवाकर उसके पैसों से कार खरीद ली। उनका तर्क था कि महामारी का दौर है, सब साथ में मर रहे हैं। मैं पैसा किसी और के लिए क्यों छोड़ूँ सो सब खुद ही खत्म कर दूंगा। मरने के पहले अपनी पसंद की कार में घूमने का सुख तो प्राप्त होगा।

अतः कतारें डिजिटल जगत के बाद भी यथावत हैं। उनका अपना अस्तित्व है जो इतना सशक्त है कि वह कभी समाप्त नहीं हो सकता जैसे इस देश की गरीबी। जब तक यह वर्ग है कतारें लगती रहेंगी। कोविड के दौर में सरकार द्वारा खूब व्यवस्थाएँ बनाई गईं। पहले जाँच की, अस्पतालों की, भर्ती की, दवाओं की और अब टीकाकरण की। डिजिटल वर्ग को सब मिला लेकिन गरीब वर्ग फिर पीछे छूट गया कतारों में। एक टीकाकरण केंद्र पर पहुँची रही थी, तो उस केंद्र से वापस आती दो बुजुर्ग महिलाओं ने मुझे रोक लिया। यह बताते हुए पूछा कि टीके की- “पहली खुराक लग गई, दूसरी कैसे लगेगी?” मैंने कहा-“जैसी पहले लगी थी।”
वे बोली- “नहीं लग रही, हम सुबह से पैदल चल कर आये और कतार में तीन घंटे लगे रहे, लेकिन उन्होंने लौटा दिया बोला मोबाइल से आओ।”
पहले में समझी नहीं, फिर समझ आया कि अपॉइंटमेंट लेकर आना होगा, सो मैंने पूछ लिया-“आपने नहीं लिया अपॉइंटमेंट?”
वे बोली- “क्या होता है ये?”
मैंने कहा- “मोबाईल में लेना है ऐप्प से!”
वे बोली-“किससे लेना होता है?”
मैंने कुछ नहीं कहा!
वे फिर बोली -“आप हमारी मदद कीजिये हमें टीका लगवा दीजिये।”
मैंने कहा -“आपके बच्चे होंगे, वे जानते होंगे।”
वे बोली-“आज कल के बच्चे कहाँ सुनते हैं हमारी, और उनके पास भी मोबाइल नहीं, पड़ोसी के पास है, लेकिन उसने किसी को नंबर देने से मना किया है।”
वे गिड़गिड़ाने लगीं। मुझे दया आ गई। मैं सेंटर पर पूछताछ करने चली गई।
एक सज्जन मिले, बोले “हम आदेशनुसार काम करते हैं। हमारे हाथ में कुछ नहीं।”
मैंने पूछा-“कोई तो उपाय होगा?”
वे बोले- “शाम तक रुकें यदि टीका बच गया तो लग जायेगा।”
मैंने उन महिलाओं से जस का तस कह दिया। उन्होंने पूछा कि “यदि बचता हो तो रुक जाएंगे।”
जवाब था कोई निश्चित नहीं, सब आज की स्थिति पर निर्भर करता है।
वे फिर गिड़गिड़ाने लगीं, बोलीं टीका लगना जरूरी है नहीं तो राशन कार्ड बंद हो जाएगा। अब तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न था। वे महामारी से बचने के लिए टिका नहीं लगवा रहीं। उनकी राशन की व्यवस्था का सवाल था।

खैर! उन्हें यह समझा कर घर भेज दिया गया कि वे शाम को पुनः आ कर देख लें। उन सज्जन पुरुष ने अपना फ़ोन नंबर भी दे दिया। वे वापस लौट गई और मैं भी।

वे फिर लौटेंगी कतार में लगने के लिए।

स्कूल का शनिवार

हमारा स्कूल हफ्ते में छह दिन लगता था पर शनिवार को हमे आधे दिन में छुट्टी मिल जाया करती थी और उस दिन हम अपनी पसंद के कपड़े पहन कर जा सकते थे जिससे हमारी स्कूल की पोशाक धुल सके। सभी बच्चे उस दिन-रंग बिरंगे कपड़ों में आते थे। खूब मज़े करते थे।

हमारी कक्षा में एक लड़का पढ़ता था जो शनिवार को भी स्कूल की पोशाक में आता था।
हम उसे बहुत चिढ़ाते थे उसका दिन भर मज़ाक बनाते थे। वह भी हँसता रहता था। कभी बुरा नहीं मानता था। एक दिन मैंने उससे पुछा की तुम हर शनिवार को ऐसा क्यों करते हो। वह बोला मेरी माँ भूल जाती है की आज शनिवार है।
हम कहाँ हारने वाले थे, मैंने कहा की अब हर शुक्रवार को मैं तुम्हें याद दिला दूँगी। मैं उत्सुकता से शुक्रवार का इंतज़ार करने लगी और शुक्रवार आ गया पर वह लड़का उस दिन नहीं आया और फिर शनिवार को स्कूल की पोषाक में ही स्कूल आया। मैंने फिर पूछा और उसका वही जवाब। उन दिनों परीक्षा के फॉर्म भरे जाने थे तो हमारे सर सारे बच्चों से उनके माता पिता के नाम पूछकर उनके व्यवसाय की जानकारी भी भर रहे थे। हमने बड़े मज़े से सारी जानकारी बता दी और दूसरों की ध्यान से सुनने लगे। जब उस लड़के की बारी आई तो उसने अपनी माँ का नाम बताया और पिता के नाम के आगे स्वर्गीय लगाया। उस समय स्वर्गीय शब्द किसी अन्य उपाधि की तरह लगा। पर सर के क्षमा प्रार्थी होने पर कुछ अजीब लगा। किसी की पूछने की हिम्मत न हुई की यह क्या हुआ। पर अपनी उत्सुकता के कारण मैंने सर के बहार निकलते ही स्वर्गीय का मतलब पूछ लिया और उन्होंने बताया की उसके पिता अब नहीं हैं। इस बात की कल्पना तक करना मेरे लिए संभव नहीं था। माता या पिता का जीवन में ना होना समझ से परे था।

जैसे तैसे स्कूल का दिन बीता। घर आकर सारी बात अपने माता पिता को बताई। बहुत दुःख हुआ था सुनकर सो पिताजी दुसरे दिन अपने साथ मुझे भी प्रातः सैर पर ले गए। मैं चुप चाप चल रही थी। तभी वह लड़का मुझे स्कूल की ही पोशाक में अखबार बाँटता दिखा। उस दिन पहली बार में बिना कोई सवाल पूछे सब समझ गयी।

मेरे हिस्से के पिता

सभी को अपने हिस्से का पिता मिलता है,
उसे विशेष रूप से महान होने की आवश्यकता नहीं,
उसका केवल पूर्णतः पिता हो जाना ही उसकी महानता है,
मेरे हिस्से के पिता पूर्णतः पिता थे।

इस बात में कहीं कोई संदेह नहीं है कि किसी भी बेटी के जीवन में प्रथम पुरुष उसका पिता होता है, और उसके जन्म के साथ ही उसका स्थान उस पुरुष के जीवन में तय हो जाता है, जिसके अनुसार ही उस बच्ची के विकास का द्वार खुलता है।
मेरे पिता के जीवन में मेरा स्थान उनके हृदय में था, और इस बात का संकेत उन्होंने मेरे जन्म के साथ ही दे दिया था।

आज से लगभग तीन-चार दशक पूर्व जब मेरा जन्म हुआ तब बेटों के जन्म को महानता प्राप्त थी, उनके जन्म पर उत्सव का आयोजन किया जाता था जबकि लड़की के जन्म को कोई विशेष महत्त्व नहीं था और फिर ऐसे घर में जन्म लेना जहाँ बड़े पिताजी की पहले ही चार संतानें लड़कियाँ हों, और दादा जी को वंश बृद्धि के लिए एक पोते की परम आस हो, एक दयनीय जन्म था। किन्तु मेरे पिता ने बाकायदा सुनहरे रंग के निमंत्रण पत्र पर मेरे जन्म की दावत रख सबको मेरे जन्म की सूचना दी, तब मैं कुछ पाँच महीनों की थी। उनकी इस दावत ने तय कर दिया था कि वे मेरा जन्म जीवन भर उत्सव के रूप में मनाएँगे।

उनके मेरे प्रति प्रेम से मुझे उस छोटे से कस्बे के अनुसार सबसे अच्छी शिक्षा का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हायर सेकंडरी के बाद उस कस्बे में उच्च शिक्षा के कोई खास विकल्प नहीं थे तब उन्होंने मुझे कस्बे के बाहर जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने की न केवल प्रेरणा दी अपितु साधन भी उपलब्ध करवाए। मैं अपने मुहल्ले की पहली बाहर जा कर पढ़ने वाली लड़की बनी जिसके बाद अन्य लड़कियों के लिए भी उच्च शिक्षा  के रास्ते खुल गए।

उनके लिए यह सब करना आसान नहीं था। संसाधन सीमित थे, और जिम्मेदारियां बहुत अधिक किन्तु वे उस वृक्ष की भाँति थे जो अपना सर्वस्व देकर सभी को उसकी आवश्यकता के अनुसार पोसता रहता है।  उनके होने का आभास इतना न था जितना कि उनके न होने का होता है, अभी भी लगता है कि वे किसी पर्दे के पीछे से मुझे परिपक्व होते हुए देख रहे हैं।

उनकी दी हुई शिक्षा कि – “हमेशा अपने से नीचे वाले व्यक्ति को देखकर अपने जीवन को तौलो” आज मेरे जीवन का मूल मंत्र है।

वार्षिकोत्सव की कुर्सियाँ

भारत के स्कूल कॉलेजों में वार्षिकोत्सव एक ऐसा उत्सव है जिसे हर प्राणी जी जान से मनना चाहता है। लगभग एक महीनों के  लिए पढ़ाई लिखाई बन्द कर सभी को अपने भीतर के कलाकार को बाहर लाने का मौका मिलता है जो बाहर आने के लिए किसी पिंजरे में बंद जंगली भेड़िये की तरह तड़पता रहता है, और कॉलेज के वार्षिकोत्सव के बाद फिर पिंजरे में जाकर बंद हो जाता है क्योंकि हमारे देश में कलाकारों के लिए कोई स्थान नहीं है और न ही कोई रोजगार ही है। ग़ालिब, मीर, ज़ौक़, प्रेमचन्द और अन्य कई उच्च कद के नाम गरीबी के चपेट में आ कर ध्वस्त हो गए। कला हमारे देश में या तो साइड बिज़नेस है या कैम्प बिज़नेस एवं वार्षिकोत्सवों के आयोजन का मकसद भी किसी कलाकार की खोज नहीं होता। इस लेख को बहस का मुद्दा न बनाते हुए सीधे किस्सा शुरू करते हैं-

पात्र परिचय
पांडे जी- इंजीनियर श्रीवास्तव के दोस्त।
श्रीवास्तव- पांडे जी के दोस्त, बड़े सरकारी कॉलेज में इंजीनियर।

पांडे-“क्या बात है साहब? खूब चहल पहल दिख रही है।” (इंजीनियर साहब के दोस्त पांडे जी ने इंजीनियर साहब श्रीवास्तव जी से पूछ लिया। )

श्रीवास्तव-“अजी काहे की चहल-पहल जब से नए प्रिंसिपल साहब ने जॉइन किया है तब से रट लगा कर बैठे हैं कि वार्षिकोत्सव करवाएंगे किसी बड़े नेता को बुलाकर और खूब फोटुएँ छपवाएँगे अखबार में।

पांडे- तो श्रीवास्तव जी इसमे बुराई क्या है? इसी बहाने एकाध फ़ोटो आपका भी छप जाएगा।

श्रीवास्तव-खाक छपेगा फ़ोटो। साहब का क्या? उन्होंने तो इच्छा कर ली अब तैयारियां तो हमें करनी हैं। उपर से कॉलेज के वित्त विभाग की कंगाली संभाले नहीं संभल रही।

पांडे-इत्ते बड़े कॉलेज में भी कंगाली का दौर? तनखा तो बट रही हैं न समय पर?

श्रीवास्तव-काहे ऐसे संगीन सवाल पूछ कर दिल की धड़कन में तेजी लाते हो भाई? बीवी बच्चे वाले आदमी हैं, और इस नए जमाने की बीमारी का कोई भरोसा नहीं। कल को बोलेंगे की पुराने मित्र से बात करने से कोई वायरस फैलता है और क्या पता अब तक फैल भी गया हो! और हम टें बोल जाएं।

पांडे- अरे! शुभ-शुभ बोलिये। बीवी बच्चे तो हमारे भी हैं। संध्या काल में मरने मारने की बातें, अरे राम-राम! जाने दीजिए, चलिए चाय पी जाए।

श्रीवास्तव-चलिए पी लेते हैं चाय, वैसे भी नया प्रिंसिपल तो पानी तक को नहीं पूछता। सोचता है हम सब हवा से चल जाएंगे। सो, हवा भरता रहता है और कुछ लोगों में तो चाबी भी भर रखी है।

पांडे-कैसी चाबी?

श्रीवास्तव-अरे! बड़ा ऊंचा खिलाड़ी है। काम के आदमी को सूंघ के पहचान लेता है।

पांडे- तो तुम्हें क्या पहचाना?

श्रीवास्तव-अरे! मुझे तो सूंघ के छोड़ दिया। चपरासियों के काम करा रहा है। लाइटें ठीक करना, सड़क साफ करना, गुसल खानों की मरहम्मत करना, कुर्सियां बनवाना, कार्ड छपवाना, आदि-आदि।

पांडे-अब भी आदि के लिए स्थान है।

श्रीवास्तव-ये तो कॉलेज के काम हैं, वे भी आधे, साले ने घर के भी दे रक्खे हैं।

पांडे-ओह! हो! हो!, यह तो बड़ा ख़सीस निकला।

श्रीवास्तव-तो क्या? मुझे मुँह ज़मीन से मिलाने का शौक है? अच्छा अब इंटरवियू लेना छोड़ और यह बता की क्या मदद कर सकता है तू मेरी?

पांडे-तू बोल क्या करूँ?

श्रीवास्तव-किसी बढ़ई को जनता है? उसे कार्यक्रम के लिए स्टेज पर बैठने को कुर्सियां चाहिए वो भी ऐसी कि- “कहीं न हों जैसी।”

पांडे-बढ़ई तो है एक पहचान का। काम भी अच्छा करता है? अपने मालपानी जी हैं न!

श्रीवास्तव-कौन वो पी डब्लू डी वाले?

पांडे- हाँ वही!

पांडे- उनका फर्नीचर उसी ने बनाया है। ऐसा लगता है कि दहेज का है। खूब चमकता है?

श्रीवास्तव- भाई मैं हाथ जोड़ता हूँ (गिड़गिड़ाते हुए)! कुर्सियाँ बनवा दे। खूब एहसान होगा तेरा।

पांडे-अरे! एहसान कैसा? दोस्त है तू मेरा, भाई जैसा, और फिर कौनसा कुर्सियाँ मुझे बनानी हैं? फोन ही तो करना है। अभी लगता हूँ (मोबाइल निकाल कर मालपानी जी को फ़ोन करता है)

“हेलो! मालपानी जी, अरे! आपको खूब याद कर रहे थे श्रीवास्तव और मैं, वो कह रहा था कि बड़े भले आदमी हैं आप और भाभी जी के तो क्या कहने। कितनी कर्मठ महिला हैं। कितना सुंदर घर सजाया है। वरना आज कल की औरतों को तो पार्टियों और पार्लरों से फुरसत कहाँ। जी वो घर से याद आया! आपकी फर्नीचर में चॉइस बहुत उम्दा है। नंबर दे सकते हैं अपने बढ़ई का। जी अच्छा व्हाट्सएप कर दीजिए! और सब सकुशल? अच्छा नमस्ते! और घर आइये कभी भाभी जी के साथ।”

फोन काट कर कहते हैं- कह रहे हैं व्हाट्सएप करते हैं नंबर। तो कैसी बननी हैं कुर्सियां?

श्रीवास्तव- जैसी इंद्र के दरबार में होती हैं। खुद को इंद्र से कम नहीं समझता वह। कल कह रहा था,” श्रीवास्तव कुर्सियां तो ऐसी होनी चाहिए कि बैठने वाले को जीवन भर याद रहे कि वह कभी कुर्सी पर बैठा था।”

पांडे- हूँ! तो शौकीन है!

श्रीवास्तव- नई कुर्सी मिली है न, हर जगह नई कुर्सी चाहता है। वर्ना जो वार्षिकोत्सव कॉलेज खुलने से लेकर सात सालों में कभी न हुआ वो अचानक क्यों होने लगा? मेरी पर्सनल राय में तो ऐसे किसी उत्सव में पैसे खर्चने की कोई आवश्यकता नहीं है। और इन आज कल के लौंडे लपाटों के लिए तो कतई नहीं। सुना है इतने खतरनाक हैं कि पिछली बार मंत्री जी के दौरे पर तो काली स्याही से सत्कार किया था, बेचारे सूरजमुखी से मंत्री जी के मुख पर भौरों का आक्रमण दिखाई देता था।

पांडे- हाँ श्रीवास्तव खबर तो मैंने भी पढ़ी थी। खैर.. तू तो अपना काम कर। ये ले व्हाट्सएप की टुंग बजी, आ गया नंबर।

श्रीवास्तव-अरे पांडे तेरा बहुत शुक्रिया, तूने मेरा बड़ा काम करवा दिया। मैं आज ही इसको कुर्सी की फोटू भेज दूँगा की कैसी छापनी है कुर्सी।
अरे! बस एक काम और करवा दे एक बेहतरीन दर्जे का फोटुग्राफर और दिलवा दे, बस मेरा तो काम ही आधा हो जाएगा।

पांडे- पहले बोल दिया होता भाई! मालपानी जी के बच्चे की शादी का एल्बम देखा था मैंने, एक नंबर! क्या फोटुएं खींची थी, भाभी जी की तो इतनी बढ़िया कि किसी फिल्म की नायिका दिख रहीं थी।

श्रीवास्तव- मैं देख पा रहा हूँ पांडे तुझे भाभी जी में खासी दिलचस्पी है।

पांडे- देख श्रीवास्तव, कुछ भी मत बोल मैंने तो जो महसूस किया बोल दिया, लगता है तुझे नंबर नहीं चाहिए।

श्रीवास्तव- अरे नहीं भाई, तू तो खामखा बिदक गया। जाने दे भाभी जी को। तू तो फोटुग्राफर का नंबर जुगाड़ दे बस।

पांडे- ठीक है! लेकिन आइंदा ध्यान रहे। कोई ऐसी-वैसी बात नहीं करना।

श्रीवास्तव-अरे न न्ना! कभी नहीं, माफ़ी, दोनों कान पकड़कर। बस तू पैसे की बात भी सम्हाल लेना दोनों से।

पांडे- (दयालु स्वर में) अरे! अपने ही आदमी हैं, जो बजट हो बता देना और दे देना।

कुर्सियां बन कर आती हैं,  वार्षिकोत्सव का दिन आता है, सज जाती हैं। खूब फोटुएं खिंचती हैं। खूब वाह-वाही होती है। फोटुग्राफर ने डिजिटल कैमरे का इस्तेमाल कर फोटुएं शाम को ही सी डी के रूप में भेजने का वादा कर कार्यक्रम की समाप्ति का उत्साह दुगना कर दिया होता है।

शाम को सब निपटने के बाद प्रिंसिपल साहब एलान करते हैं कि वार्षिकोत्सव की फोटुएं बड़ी टी वी पर एक साथ देखी जाएँगी जिसके आयोजन का जिम्मा वाईस प्रिंसिपल मैडम के हाथों में था और साथ ही यह भी तय हुआ कि प्रिंसिपल साहब नई कुर्सी पर बैठकर ही फोटुएं देखेंगे, सो घूम फिर कर अब सारी जिम्मेदारी श्रीवास्तव जी पर आ गई।

श्रीवास्तव जी ने खूब उम्दा इंतेज़ाम दिया फोटुएं देखने का, ओहदे के हिसाब से कुर्सियां सजा दी गईं, और प्रिंसिपल साहब अपनी पूरी टीम और वाईस प्रिंसिपल मैडम के साथ नई कुर्सियों के बीच फोटुएं देखने बैठ  गए। प्रोजेक्टर पर चित्र प्रदर्शनी प्रारंभ हुई। चित्र आगे बढ़ते जा रहे थे किंतु प्रिंसिपल महोदय कहीं नजर नहीं आ रहे थे। वे गुस्से से  लाल पीले और अंततः नीले पड़ गए।
चारों ओर सन्नाटा छा गया…

अगले दिन इंजीनियर श्रीवास्तव को मेमो दे दिया गया जिसमें पूछा गया कि प्रिंसिपल साहब तस्वीरों में से कहाँ गायब हो गए? इसकी जवाबदेही कौन लेगा? जिस पर पहले प्रश्न के जवाब में इंजीनियर साहब लिख रहें है- प्रिंसिपल छोटे कद के होने के कारण दिखे नहीं आदि आदि.. अगले जवाब के लिए वे पांडे को फोन लगाते है.. हैलो! हेलो! पांडे मैं श्रीवास्तव! क्या कहा? आवाज नहीं आ रही?

एक चूहे की रहस्यमयी मृत्यु पर!

अकसर सोमवार बड़े भारी होते हैं। रविवार की व्यस्त छुट्टी के बाद जब सोमवार को सुबह ऑफिस पहुँची तो पाया कि पूरा केबिन दुर्गंध से भरा हुआ है, किसी जीव के मरने की दुर्गंध। बिन सोचे ही ये अनुमान लगा लिया गया कि शायद कोई चूहा मर गया होगा क्योंकि चूहे किसी भी संस्था का अभिन्न अंग होते हैं और अमूमन वे उस ऑफिस के कर्मचारियों से अधिक सक्रिय होते हैं। बाकी कर्मचारियों की तरह वे भी अपने हिस्से की रोटी के लिए भरपूर मेहनत करते हैं। इंसानो को यदि कोई बहुत करीब से जनता है तो वे चूहे ही हैं। वे हर समय पूर्णतः चौकन्ने रहते है कि कब आप कोई चूक करें और वे उस चूक का फायदा उठाएं।

गणपति का वाहन होने के बावजूद भी चूहों को समाज में कोई वशेष सम्मान प्राप्त नहीं हैं। आप में से कुछ लोगों को पता होगा कि चूहे को गणपति का वाहन क्यों कहा गया। जो नहीं जानते उन्हें यह जानकर दिलचस्प लगेगा कि चूहा तीव्र बुद्धि वाला चंचल प्राणी है जो मनुष्य की बुद्धि और मन का प्रतीक होत है एवम गणपति अपने विवेक से दोनों पर नियंत्रण रखते हैं। अतः चूहे का प्रतीक उनके पैरों के नीचे देखा जाता है। अन्य कई प्रचलित मान्यताओं में से मुझे यह ठीक तरह से समझ आती है सो मैंने उसका जिक्र कर दिया।

ऐसा भी माना जाता है कि चूहा मनुष्य के साथ रहने वाला उसका सबसे पुराना साथी है, जो इतना वफादार है कि पीढ़ी दर पीढ़ी वह आपका घर नहीं छोड़ता और अपनी हर वस्तु पर अपना बराबरी का अधिकार समझता है, और फिर ये अगर किसी कार्यालय में पदस्थ हो जाएं तो कहना ही क्या। अगर कोई तरकीब इज़ाद हो सके तो आप चूहों से किसी भी कार्यालय के गूढ़ से गूढ़ रहस्य को जान सकते हैं। गणेश जी का वाहन होने के साथ मुझे कहीं न कहीं ये भरोसा है कि चूहों को मनुष्य की हर बात समझ आती है और क्या पता यदि वे बोल सकते तो वे आज खुफिया एजेंसियों में बहुत उपयोगी साबित होते। चूहों पर हुए शोध में ऐसा पाया गया है कि, चूहे कितनी भी विषम परिस्थितियों में जीवित रह सकते हैं। उनकी ओर ध्यान देने पर उनकी यह बात मनुष्य के लिए एक प्रेरणा साबित हो सकती है किंतु वे प्रेरणा से ज्यादा परेशानी का सबब बनते हैं। वे बेरहमी से हमारी बेशक़ीमती आवश्यक वस्तुएँ कुतर देते हैं और हमें लाचार कर देते हैं और उनकी अत्यधिक कुतरने की प्रवत्ति के कारण ही वे मनुष्य के गुस्से का शिकार होते हैं। ऐसे भी मनुष्यों को अपने आगे कोई और कम ही पसंद आता है, फिर चूहे तो कोई  वशेष रूप रंग लेकर भी नहीं आते।

वैसे पौराणिक कथाओं से लेकर किस्से कहानियों तक चूहों को वफादार देखा गया है और मिकी माउस के रूप में पसंदीदा काल्पनिक किरदार माना गया, किन्तु वास्तविकता में वे मनुष्य के सम्मान और प्रेम को तरसते हैं। इस नफरत का कारण प्लेग जैसे महामारी भी हो सकती है, जो भारी तबाही का कारण बनी और सर्वाधिक कुख्यात हुई। ब्लैक डेथ के नाम से प्रचलित इस बीमारी को सबसे प्राचीन बीमारियों में से एक माना जाता है जिसका नाम सुनते ही रूह कांप जाती है। किन्तु यह तय कर पाना अभी भी मुश्किल है कि इतने व्यापक रूप में उस महामारी के फैलने में चूहों के योगदान अधिक था या मनुष्यों का।

खैर वह जो भी रहा हो, चूहे मनुष्यों को स्वीकार नहीं।
न घर, न पड़ोस, और न ही कार्यालय। इएलिय हर सप्ताह के अंत में इस कार्यालय में चूहों को मारने की दवा रखी जाती है, जिसे चूहों को नाश्ते की तरह खाने की आदत हो गयी है। पर क्या कह सकते हैं? इस बार नाश्ते के बाद पानी न मिला हो। दुर्गंध के चलते, न चाहते हुए भी पूरे कार्यालय का सामान हटा कर देख लिया गया, किंतु मरा हुआ चूहा कहीं नहीं मिला, केवल दुर्गंध, जो सुबह तेज, थी और कुछ देर में उसके कम होने का अहसास होने लगा। कई क्विंटल रद्दी निकली, और कई अनुपयोगी वस्तुएँ जिनका अस्तित्व तक भूल चुके थे हम।
पता नहीं जो मर गया वह चूहा ही था या कुछ और? किंतु अगर चूहा था तो वह अपने साथ कार्यालय के कई गूढ़ रहस्य लेकर चला गया।

भगवान उसकी आत्मा को शान्ति दे!

अरे!

मालूम नहीं इस देश के ये तस्वीरें कोई कैद कर रहा है या नहीं। यह भी नहीं मालूम कि किसी को फर्क पड़ रहा है या नहीं। पर इतना मालूम है कि मैंने मृत्यु के प्रति इतनी असंवेदनशीलता पहले कभी नहीं देखी। इसका कारण यह हो सकता है कि लोग बहुत संख्या में मर रहे हैं। मेरा अनुमान है कि अब तक शायद इस देश में कोई भी ऐसा नहीं बचा होगा जिसने किसी अपने को न खोया हो, फिर चाहे वो अपना, उसका कोई सगा, करीबी मित्र, या दूर का रिश्तेदार हो सकता है। अब आप ही अंदाज लगा सकते हैं कि डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में कितनी मौतें हुई होंगी, और अभी तो हम केवल महामारी के बीच में हैं। इस वक़्त जब कोई किसी के मरने की खबर सुनता है तो बस एक ही शब्द मुंह से निकलता है “अरे!” – इसके बाद कुछ बोलने को नहीं रह जाता। यह दौर ऐसा है जहाँ लोग डिजिटल सामाजिक मंच का भरपूर उपयोग करते हैं। किसी की मृत्यु की खबर पढ़ते ही ‘रिप’ या ‘ॐ शांति’ लिख कर आगे बढ़ जाते हैं, और फिर अपना काम में लग जाते हैं, बिन ये सोचे इस महामारी में हुई प्रत्येक मृत्यु की जिम्मेदारी इस देश में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति की है।


और एक कमाल बात है इस देश में रह रहे लोगों की, वे कभी अपने आप को दोषी नहीं देखते, उनकी कभी कोई गलती नहीं होती, वे बीमार भी होते हैं तो दोष सामने वाले का होता है, और उस सामने वाले के लिए उसके सामने वाले का होता है। वे तो बस शिकार होते हैं शायद इसी को अंग्रेजी में ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना कहते हैं। दरअसल इस बेचारगी की आदत उनमें बचपन से ही आ जाती है। वे इतने असुरक्षित माहौल में बड़े होते हैं जहाँ हर घड़ी उन्हें परखा जाता है, जैसे उनका जन्म किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए हुआ हो, जिसमें उन्हें केवल अव्वल आना है। फिर इसमें भी दो फ़ाड़ है, जो अव्वल आये वे उससे कम में असुरक्षित हो जाएंगे और बाकी बचे लोगों को जीने का हक ही नहीं, सो असुरक्षित ही मर जायेंगे। सो सब बेचारे हो गए। फिर इस भयंकर वायरस के फैलने की जिम्मेदरी ले कौन? अव्वल आने वाले लेंगे नहीं, और उनसे नीचे वालों की तो क्या मजाल कि वे कुछ फैला सकें। तो यह वायरस कैसे फैल रहा है कोई जानता नहीं?

कुछ लोग अपने आप को ऐसे भी बहलाये हैं कि किसी पड़ोसी देश ने जैविक हथियार छोड़ दिया, और उसको 2024 तक के लिए सेट कर दिया है। तो जब इस मानसिकता ने इस बीमारी को अपने दिमाग में 2024 तक सेट कर लिया, तब वे इसको फैलने से रोकने के लिए कोई उपाय करेंगे ही क्यों? वे तो मान चुके हैं कि उनके व्यक्तित्व से बड़ा वायरस का व्यक्तित्व है। और चलो एक बार को ये हाइपोथिसिस बना भी लें कि छोड़ दिया हथियार किसी ने, तो आप बचने का कोई प्रयास नहीं करेंगे, अपनी छाती आगे कर देंगे कि आओ वायरस घुस जाओ मेरे भीतर। हमारे पास उदाहरण है ऐसे देश का जहाँ सच में हथियार छोड़े गए, कई लोगों की जान चली गई, पूरे शहर ध्वस्त हो गए, किन्तु वे रिकॉर्ड कम समय में उठ खड़े हुए क्योंकि वहाँ कोई बेचारा नहीं रहता था। किन्तु हमें तो उदहारण केवल परीक्षा की कॉपी में पास होने के लिए लिखने हैं, असल जिंदगी में उदहारण से क्या सीखना। हम हर घड़ी अपने देश की गरीब जनता का हवाला देते रहते हैं, कहते फिरते हैं कि अस्पतालों में सुविधओं की कमी है, तो क्या हम इन असुविधाओं के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? हम भीख लेने में इतने मसरूफ हैं कि अधिकारों के बारे में सोचने की फुर्सत ही कहाँ है? इस महामारी ने इस देश में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति की कलई खोल कर रख दी। मुसीबत के समय एक दूसरे का साथ देने की बजाय हमने होड़ करी, धंधा किया, और तांडव किया और अब इतने असंवेदनशील हो चुके हैं कि किसी की मृत्यु पर कह रहे हैं -अरे!

लगता है कुछ ज्यादा लंबा लिख दिया!

ख़ैर..

आप की तारीफ

नमस्कार!
बहुत प्रसन्नता हुई आपसे मिलकर। क्या मैं जान सकता हूँ आपका शुभ नाम?
जी क्या करेंगे आप नाम जानकर?
कुछ खास नहीं, बस नाम जान लेने से एक पहचान का बोध हो आता है।
पहचान तो स्वयं मिथ्या है। आप जान लीजिए कि मैं जो हूँ, जो दिखता हूँ दरसल मैं वो हूँ ही नहीं, और जो मैं हूँ वो मैं बन ही नहीं पा रहा।
ह्म्म्म!
क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आप क्यों वह नहीं बन पा रहे जो आप हैं?
यह एक सही सवाल हो सकता है अगर मैं इसका जवाब सही दे सका तो! बात यह है कि इस नाम के चक्कर में ही फस कर रह गया हूँ। अब गुमनाम हो जाना चाहता हूँ।
परंतु जो पहले ही आपका नाम जानते हैं उनका क्या?
जब वे मुझे मुझसा जान जाएंगे तो मेरा यह नाम उनके लिए बेमानी हो जाएगा।
आपकी बातों से उदासीनता की महक आ रही है। भला जिस नाम के लिए सारी दुनिया इतने जतन कर रही है आप उसे ही छोड़ देना चाहते हैं। लगता है आपने इस नाम के चक्कर में कोई गहरी ठोकर खाई है।
कह सकते हैं आप ऐसा भी। किन्तु शेक्सपियर के what’s there in name ने मुझ पर इस गहराई से चोट की कि मैं नाम की माया से बाहर निकल आया।
तो क्या अब आप नाम नहीं कमाएंगे?
जब माँ पिताजी ने नाम रखा था तो प्रेम-वश रखा, स्कूल पहुँचते ही नाम वह सीरियल नंबर बन गया जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं था कक्षा की मोटाई कम अधिक होती तो वह नंबर भी अपनी जगह से हिल जाता। कॉलेज पहुंचने पर वही नाम नोटिस बोर्ड का हिस्सा बन गया जो हर लापरवाही में सबसे ऊपर लिखा जाने लगा चाहे वह अनुपस्थिति हो या अनुत्तीर्ण हो।
तब यह विचार आया कि इस प्रकार की व्यवस्था से किसी को भी क्या हासिल है। क्यों ये नोटिस बोर्ड हमेशा नकारात्मकता का हिस्सा बनता है और यदि बने भी तो मुझे क्यों इसका हिस्सा बनाया जाता है। हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में क्यों ऐसी व्यवस्था नहीं जहाँ कोई अपनी रुचि के अनुसार शिक्षा ग्रहण कर सके। क्यों मैं शेक्सपियर, चेखव, रिल्के, पढ़ कर समाज में अपनी हिस्सेदारी नहीं दे सकता। क्यों वे हमें यंत्री के स्थान पर यंत्र और चिकित्सक के स्थान पर संवेदना हीन बूत एवं ऐसे ही अनेक उदाहरण बना कर छोड़ देना चाहते हैं केवल नाम कमाने को। बस उस समय से ही नाम से मोह भंग हो गया।
तब आप क्या चाहते हैं?
मैं कुछ भी चाहना नहीं चाहता हूँ।
तब तो आपका जीवन व्यर्थ है। बिन चाह के आपको कोई राह कैसे मिले।
है तो चाह कुछ भी न चाहने की। किन्तु अब इसे भी समाप्त कर रहा हूँ।
जब कोई चाह ही न होगी तो क्या रह जायेगा आपके जीवन में। बिन नाम और चाह के तो आप जीते हुए भी मृत हो जाएंगे।
तो क्या आप नाम और चाह के साथ पूर्ण रूप से जीवित है?
जी हाँ, मेरी इच्छाएँ ही मुझे जीवित रखती हैं।
जी अवश्य और दुखी भी।
परंतु यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ?
आप जीवित हैं या नहीं?
आपको क्या लगता है?
मुझे तो संदेह है। मैं आप को जीवित मानने को तैयार नहीं।
फिर तो आपको बहुत रोमांच होगा एक मृत मनुष्य से आमने सामने बात करने पर।
कोई रोमांच नहीं मुझे, हाँ आश्चर्य अवश्य है कि आप जीते जी मृत हो जाना चाहते हैं।
नहीं मैं जीते जी मृत नहीं हुआ। मेरा नाम हटाकर आज आपने मुझ मृत आत्मा से जीवन्त बात की। यह यो मेरी मृत्यु पर विजय हुई। और यही प्राप्त करने तो मैं निकला था नाम तक छोड़ कर।

ऊँट किस करवट बैठेगा।

बड़ी भारी समस्या हो गयी यह तो। हमारा पूरा खेल इस ऊँट पर टिका है और ये ऊँट है कि बैठने का नाम ही नहीं लेता।
पर बैठ क्यों नहीं रहा है यह ऊँट?
शायद इसे भी पता लग गया है कि जब तक यह खड़ा है इसकी आव-भगत है। इसके बैठते ही खेल समाप्त और उसके साथ इसकी आव- भगत भी।
तो अब करें क्या?
इंतजार के अलावा कर भी क्या सकते हैं। अब ऊँट कोई आदमी तो है नहीं कि कह दिया तशरीफ़ रखिये तो रख ली तशरीफ़। ऊँट का अपना मिज़ाज होता है। बैठना होगा तो बैठेगा नहीं तो नहीं बैठेगा।
तुम्हें याद है कि आखरी बार कब बैठा था यह ऊँट?
हाँ- हाँ क्यों नहीं, बिल्कुल याद है। अभी कुछ दिनों पहले ही बैठा था, मेरी किस्मत पर। फिर उठने का नाम नहीं ले रहा था। इस ऊँट को उठाने के लिए न जाने कितने अनुष्ठान कराए। फिर एक पंडित ने ऊंटनी के पैर में घुँघरू बाँधने की सलाह दी और कहा कि उसे लाल रंग की गोटे वाली चादर ओढ़ा कर इस ऊँट के सामने लेकर आऊँ तो यह उठ जाएगा। पूरे इक्यावन सौ लेकर यह नुस्खा बताया और यकीन मानो जैसे ही मैं उसे इसके सामने लेकर आया, ऊँट उठ गया।
तुम्हारी किस्मत का क्या हुआ?
वह थोड़ी दब गई। पंडित जी ने उसे उठाने के लिए ही लिए ही दोबारा ऊँट के बैठने का उपाय बताया है।
तो क्या तबसे ऊँट बैठा ही नहीं?
अरे! यही तो मुसीबत है कि यह सूरज ढलते ही बैठ जाता है और रात भर मजे से बैठा रहता है, और पौ फटते ही उठकर खड़ा हो जाता है और उसके बाद दिन भर नहीं बैठता। और पंडित जी के अनुसार इसके दिन में दाहिनी करवट पर बैठने से ही मेरी किस्मत दोबारा उठेगी।
मान लो कि यह कभी दिन में बैठा ही नहीं?
अरे ऐसे कैसे नहीं बैठेगा, पंडित जी अनुष्ठान कर रहे हैं इसके बैठने के लिए और मैं भी रात दिन इसकी सेवा में लगा हूँ कि यह शीघ्र ही बैठ जाये।
किन्तु यदि यह बैठा भी तो यह कैसे सुनिश्चित हो कि यह दाहिनी ओर ही बैठेगा?
उसका भी उपाय है। पंडित जी के अनुसार मुझे इसके पीछे ही रहना है जैसे ही यह बैठने को होगा मैं इसके बायीं ओर जाकर खड़ा हो जाऊंगा। इसे जगह नहीं मिलेगी और यह दाहिनी ओर बैठ जाएगा, और इसके बैठते ही मेरी किस्मत उठ जाएगी।

बड़े ही पहुँचे हुए पंडित मालूम होते हैं वे।
हाँ सो तो है।

तब तो सच में तुम्हारी किस्मत ऊँट के बैठते ही उठ जाएगी, करोगे क्या तुम उसके बाद। अरे भाई कुछ न करना पड़े इसलिए तो इतने अनुष्ठान कर ऊँट को बिठा रहा हूँ दाहिनी ओर, फिर सब किस्मत ही करेगी और में आराम से ऊँट पर बैठ कर मौज करूँगा।

​माफ कीजियेगा! 

माफ कीजियेगा!

गलती हो गयी हमसे, या यूं कहें की बहुत सारी गलतियाँ हुई हैं अब तक।

परंतु आप तो दयालु हैं हमें पूरा यकीन है कि आप हमें क्षमा जरूर कर देंगे। नहीं आप हमारा अस्तित्व नहीं मिटाएंगे बस इस बार बक्श दीजिये। हम् एक एक करके सभी गलतियाँ कबूल लेते हैं आपके सामने। पहली गलती कि हमने लड़की के रूप में जन्म लिया। आपके कुटुम्ब की नाक काट दी पूरी, कितना जश्न मनता जो हम लड़का पैदा हो जाते। देखिए इस अपराध की तो हम घुटनों पर क्षमा मांगते हैं। ऐसे ऊंचे कुटुम्ब में जहां सदा ही पहली औलाद लड़का होना चाहिए उसे हमने पैदा होते ही कलंकित कर दिया, सच पूछिए आज तक पछतावा है हमें इस अपराध का। अब ये कम था कि हम ज्ञानवान भी हो गए। कितनी निकृष्ट बात है यह कि हममें अपनी उम्र के लड़कों से अधिक ज्ञान और संवेदनशीलता है। यह तो लगभग अक्षम्य अपराध है। किंतु पुनः क्षमा याचना। क्षमा याचना हमारे सांवले होने की भी, एक तो लड़की का कलंक और उस पर भी साँवली। कैसे सामना करें हम आपके समाज का।

देखिए हम इस बात के लिए भी क्षमा प्रार्थी हैं कि हमारे भीतर इच्छाएँ हैं कुछ बनने की, पढ़ने लिखने की, अच्छा जीवन जीने की। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि हम आपके रीति रिवाजों की तरह चल पाएं, बंध पाएं आपके बनाये खूँटे से, आपके द्वारा बांधी हुई घंटी को गले में लटकाए रहें, और जब भी आप कुछ कहें हम हाँ में ही घंटी को हिलाएं। देखिए कितनी मेहनत कर रहें हैं इस देश में हम आपको प्रसन्न रखने के लिए। लीजिये हम यह कसम भी उठा लेते हैं की कभी भी सूरज को डूबते नहीं देखेंगे। और सर कटा लेंगे यदि किसी ने हमें बिन पर्दे के देख लिया तो। सम्मान का तो हम नाम भी नही लेंगे आपके सामने। चलिये अब यह भी मान लेते हैं कि आपके और ईश्वर के बीच का एक मात्र रोड़ा भी हम ही हैं वरना आप जैसी महान कौम का तो कबका संपर्क हो जाता ईश्वर से। और एक बात, भगवान करे ये माँ, बहन, बेटी, पत्नी, दोस्त जैसी मजबूरी कभी आप पर न पड़े, वैसे भी ये शब्द रिश्तों से अधिक गालियों में शोभा देते हैं। देखिए बस इस बार क्षमा चाहते हैं अपने जन्म पर, हमें विश्वास है कि आप दयालु हैं।

​हम से मिलिए हम देश और संस्कार हमारी जोरू (अच्छी भाषा में धर्म पत्नी)

बहुत आगे आ गए हम, खूब उन्नत हो गए, देखो कैसे बढ़िया ढंग से हमारी तरक्की हो रही है, कद, काठी, रंगत, संगत सभी तो निखर आयी है, और फिर बढ़ें भी क्यों न देश हैं हम, उन्नतशील से उन्नत होते। जब हम निकलते हैं तन कर, बन सँवर कर, पूरी चौड़ाई से तो अच्छे अच्छे हमारे जूतों में हमारी संस्कार की कढ़ाई देखते हैं। संस्कार हमारी जोरू का नाम है जिसे प्यार से बीवी या धर्मपत्नी भी कहते हैं। बहुत सुंदर कढ़ाई कढ़ती है वह। उसकी कढ़ाई से ही आप उसकी खूबसूरती का पता लगा सकते हैं क्योंकि हमारी संस्कार को हम घर पर ही रखते हैं घूंघट में, सजा कर, घुंघरू वाली झांझर पहना कर जिससे उसकी सुंदरता तो बढ़ती ही है, और उसकी हर आहट पर हमारा ध्यान भी रहता है।

खैर छोड़िए धर्मपत्नी को, जब धर्म का कोई काम करेंगे तो बिठा लेंगे उसे भी बगल में हवन में आहुति देने अभी क्यों बेकार में समय गवाएं। वैसे समय हमारे सुपुत्र का नाम है। बड़ा ही चंचल है। असल में उसकी की जिद से हम उन्नत शील से उन्नत हुए हैं । देखो कैसी चालकी से समय ने शील हटा दिया उन्नत का, पर आप किसी से कहना मत। दरअसल उन्नत हमारे पड़ोसी की बेटी है खूब हवा में उड़ती थी, पढ़ लिख कर न जाने क्या बन जाना चाहती थी। भाई अब हम देश और हमारे बेटे समय का उन्नत पर दिल आ गया फिर क्या, अब कोई रोक पाया है क्या समय को उठा लाया उन्नत को, अब उन्नत भी हमारे घर के दरवाजों के पीछे रहती है घूंघट में और क्यों न रहे भाई, देश हैं हम, बेटा है हमारा समय।

अरे आप हमें गलत मत समझिए कोई दुश्मनी नहीं है हमारी औरतो से, बल्कि हम तो दूसरी जात वालों से ज्यादा इज्जत देते हैं अपने घर की औरतों को। अब धर्म में लिखा तो नहीं काट सकते न। देश हैं हम समाज के साथ जो रहते हैं। अरे समाज हमारे बाप का नाम है। वैसे तो सारा दिन पड़े रहते हैं बिस्तर पर खाँसते- खखारते परंतु कभी हमे संस्कार की बात तक करते सुन लें तो खाल तक खींचने खड़े हो जाते हैं। उमर भी गिद्ध की लिखा कर लाये हैं। एक बार संस्कार ने बड़े ही धीरे से कहा कि आज भावना नहीं आयी तो तमतमा कर बोले इस कुलक्षणी से घर का काम नहीं होता जो उस भावना के इंतजार में बैठी रहती है। भावना हमारी काम वाली है जिसके बगैर घर का काम तो नहीं चलता परंतु उसकी दो कौंड़ी की भी इज्जत नहीं है न तो हमारे घर में और न ही बाहर। परंतु समाज के आगे मुंह नहीं खोलते, भले ही देश हैं हम।