मेरी परिभाषा

मैं
अब नहीं होना चाहती,
संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण,
न चाहती हूँ
अलंकार कोई,
किसी छंद में डूबा हुआ,
मैं किसी प्रतीक से,
नहीं चित्रित करना चाहती,
अपना अस्तित्व,
न मैं रूपकों में
चाहती हूँ उपमा कोई,
मैं सभी रसों से मुक्त हो,
विश्व-व्याकरण से बाहर आ
एक रिक्त स्थायी भाव
बन जाना चाहती हूँ,
जो शून्य में मौन-लिपि से
लिखा जा सके,
पढ़ा जा सके।

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