भोपाल गैस त्रासदी (2)

आज फिर हुई सुबह उस भयानक रात की,
अफ़सोस बाकी रह गया इंसा के उस जज़्बात की,
ज़हर घोला फिजा में या ज़िन्दगी कर दी तबाह,
उजाड़ गया ये गुल चमन, बाकि बस साया रहा,

मर गए जो मर गए, जो रह गए वोह मर रहे,
मिट गए सब धर्म-मजहब मिट ही जब इंसा गए,
सो गए सब नींद में लेकर जलन सी आँख में,
ली आखरी जब सांस तो थी घुटन भी सांस में,

गा लिया मैंने भी दुःख, उन झुर्रियों के साथ में,
रो लिया मैंने भी कुछ पल बेबसों के साथ में,
हो गया हिसाब, सबका जो मरे, जितने मरे !!
किसको थी फुर्सत की त्रियंच का ब्यौरा करे?

बिक रही है रौशनी कोई ज़रा खरीद दे,
और कालिख रात की कोई ज़रा सी कम करे..

7 thoughts on “भोपाल गैस त्रासदी (2)

  1. बिक रही है रौशनी कोई ज़रा खरीद दे,
    और कालिख रात की कोई ज़रा सी कम करे.. brought tears to my eyes ,,turned me speechless

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    1. We both were kid, and you were just new born when papa gut struck in Bhopal due to this tragedy. I could imagine the fear and stress our mother faced at that point of time, also the pain of the people who suffered the disaster..

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