भगवान् नहीं रहे

रोज़ सुबह सैर पर जाते वक़्त रास्ते में एक मंदिर के बाहर अमूमन बहुत भीड़ लगी रहती थी, पर यह क्या आज सुबह तो यहाँ पर कोई दिखाई नहीं देता, और पंडित जी की आराधना की आवाज भी सुनाई नहीं दे रही सो जानने  की उत्सुकता से मंदिर के प्रांगण में दाखिल हो गयी.

यथा योग्य अभिवादन के साथ ही शाश्त्री जी से पूछ लिया की  आज भक्त दिखाई नहीं दे रहे, भगवान् पर कोई ग्रहण है क्या? पंडित जी बोले ग्रहण तो जगत पर है बिटिया भगवान भगवान् नहीं रहे! मैंने कहा यह क्या अनर्गल कह रहे हैं पंडित जी? यह कैसे संभव है? सब संभव है. पर यह हुआ कैसे? कुछ बड़े लोगों की सभा बैठी और तय किया गया की भगवान् की क्वालिफिकेशन पूरी नहीं है कुछ कागज़ कम रह गए बाकि भगवानों से. यह कैसे हो सकता है? पहले तो पूरे थे. पर अब नहीं! कुछ नए कानून आये हैं सो भगवान् को मुश्किल हो गयी, और भगवान् हैं भी बड़े सीधे लायें कहाँ से इतने दस्तावेज़, और उनकी तो ऊपर तक कोई पहुँच भी नहीं है.

पर ये सभागार किसने भिजवाये? किसने शुरू की ये जांच की कवायत? यह तो कोई नहीं जनता, पर अब हर भगवान् की जांच होगी. हे भगवान्! यह तो बहुत बड़ी दुविधा है. पर इस जांच से होगा क्या? होगा क्या! भगवान् को मंदिर छोड़ना पड़ेगा. इतना बड़ा हो गया मनुष्य की इतना सख्त क़ानून बना दे और भगवान् को मंदिर में भी न रहने दे? हो सकता है ना भी रहने दें. और जिनकी मन्नत अभी पूरी नहीं हुई उनका क्या? वे अब क्या करेंगे? हो सकता है की इसके लिए भी भगवान् और भक्त को कोई नोटिस पीरियड दे दिया जाये या फिर मन्नत उनसे ऊपर वाले किसी भगवन पर ट्रान्सफर कर दी जाये. कुछ भी कहा नहीं जा सकता.

अरे अरे पंडितजी इन भगवान् के मंदिर के बहार तो अनगिनत भक्तों का तांता था, ऐसे तो दुसरे भगवानों के ऊपर कार्य भार बढ़ जाएगा और फिर किसी भगवान् ने काम लेने से माना कर दिया तो क्या होगा इस मनुष्य प्रजाति का? और फिर इतने व्रत, उपवास, अनुष्ठान, हवन, पूजन क्या होगा इन सब क्या? और जो गरीब इस मंदिर के बहार बैठ कर अपना रोज़गार चला रहे थे, जो भूखे यहाँ से पेट भरने को कुछ प्राप्त कर लेते थे उन सब का क्या? ये तो सभागार ही बताएँगे बेटा. पर इन सब के पीछे प्रयोजन क्या? प्रयोजन तो आज हर एक बात के पीछे पद, प्रभुत्व और पैसा है बेटा.

और पंडित जी आप! आपको तो इन भगवान् के बारे मैं सारे श्लोक, चालिसे, आरती इनके चमत्कार के किस्से सब कंठस्थ याद हैं क्या होगा इन सब का. मुझे न चाहकर भी कुछ और सीखना होगा, बात केवल आस्था नहीं की अपितु रोजगार की भी है. पंडितजी जान कर बहुत दुःख और खेद है की मनुष्य मनुष्य नहीं रहा और भगवान् भगवान् नहीं रहे……  

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