वज़ूद

तुम्हें देखकर तुम से मिलना भूल जाती हूँ,
केहना चाहूं सब मगर कुछ कह न पाती हूँ,
यूं तो अक्सर मिलती हूँ तुमसे मैं ख्वाबों में,
पर सामने पाकर तुम्हें मैं खुद खो जाती हूँ,
सुना है मैंने लोगों से, है जुदा तू लाखों मैं,
पर तुझे सोचते हुए अलग सी मैं हो जाती हूँ,
रोज़ कई बातें करती हूँ तेरी मैं औरों से,
जाने क्यूँ तुझसे बातें करते मैं घबराती हूँ,
तुमसे मिलना मिलकर चलना बात है किसमत की,
तुमसे मिलकर अक्सर गुमसुम सी मैं हो जाती हों,
यूँ तो लाखों में नाम है तेरे चाहने वालों के,
पर अपनी चाहत को सबसे ऊपर मैं पाती हूँ,
छोड़ते हैं घर, बार, पैसा लोग चाहत मैं,
तेरे लिए वज़ूद मैं अपना छोड़ जाती हूँ,

2 thoughts on “वज़ूद

  1. तुम्हारी लिखी हुई कवितायें जादा से जादा लोगों को पढने मिलें इसलिए nehal अपना वजूद इस ब्लॉग के ज़रिये जीवंत रखना …तुम्हारी समय से अबाध्य कविता और शैली प्रेरित करती हैं और चाहत का वज़ूद मिटने में ही है इसका बखूबी एहसास दिलाती है. कभी कभी जीवन में कुछ लोग आप को प्रभावित करते हैं पर उनको इस बात का इल्म नहीं हो पाता और कई बार शब्दों की ख़ामोशी कहीं खो जाती है ..सुनाई नहीं देती सिर्फ महसूस होती है . अफ़सोस होता है तब जब रूह की सच्चाई सिर्फ जुबान से बयां हो नहीं पाती कहीं गुम हो जाती है. बहुत खूब . लिखते रहो.

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    1. कोशिश जारी है आपका प्रेम और विश्वास कायम रखने की.. प्रेरित करती रहें.. आभार..

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