खरपतवार

उपजाऊ जमीन पर हल को चलाया,
उच्चतम बीज उत्तम समय लगाया,
तन मन से सींचा पर्सीव बहाया,
मेढ लगायी, पशुओं से बचाया,
फूटे अंकुर अति हर्षाया,
उपज बढे सो उर्वरक लाया,
पर लीलने मेहनत काल जो आया,
जिस खेत को सीचने लहू बहाया,
उसने किया मुझे लाचार,
उपजाऊ जमीन पर फसल से ज़्यादा,
उपज रही है खरपतवार,

खरपतवार बड़ी बीमारी,
पनपे जैसे कोई महामारी,
खेत से ज्यादा, मन पर भारी,
खाए फसल बने लाचारी,

लाचारी जिससे लड़ा अतीत,और वर्तमान भी जूझ रहा है,
बढती खरपतवार के आगे,लाचार भविष्य भी अन्धकार में झूल रहा है,
लाचारी जिससे हर क्षण एक भरोसा टूट रहा है,
खरपतवारी मानव के आगे मेहनतकश भी अपनी सुध बुध भूल रहा है,

खरपतवार जो कर्क सी व्यापक हो चुकी है,
और कितनी ही फसले इसके चलते काल की कोख में सो चुकी है,
व्यर्थ जिसकी उपज है, जिसका होना निराधार है,
ऐसी ही खरपतवार के आगे वसुधा और विश्व लाचार है!

4 thoughts on “खरपतवार

  1. खेत से ज्यादा, मन पर भारी, व्यर्थ जिसकी उपज है, जिसका होना निराधार है. सुन्दर पंक्तियाँ हैं. कविता घूढ़ अर्थ से भरपूर है . नेहल , लाचारी तो है , पर इस को भरी पड़ने नहीं देना है स्वयं पर, समाज पर, कहीं भी . लिखते रहो अच्छा लगता है…गर्व है तुम पर..

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  2. Since you have linked it to Encroachments ….i recommend reading of a beautiful English poetry by Robert frost called …Objections to being stepped on….the helplessness comes when we allow to be stepped on and with encroachment comes rebelliousness ….any tool stepped on turns into a weapon…and those you gain by encroachments of any kinds have to face the rebels!

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