धुँध

धुँध
आज प्रभात में रंग नहीं,
दृष्य नहीं, चाल नहीं,
चमक नहीं, भाव नहीं,
और कोई रौनक भी नहीं,
ऋतू आज फीकी है, ऋतू आज सिहरी है,
ऋतू आज भारी है, ऋतू आज ठहरी है,
फिर भी आकर्षण है,
हाँ!
धुँध में आकर्षण है,
क्यूँ?
धुँध आज मन की है,
और
मन आज फीका है,
हर दृष्य धुंधला है, दृष्टि जैसे बोझिल है,
आज हूँ धरा सी मैं, मन मेरा ओझिल है,
कठिन देख पाना है,
कठिन लगे बूझना,
जब दृष्टिगोचर हो,
तभी पड़े जूझना,
जैसा यह मौसम है, वैसा ही जीवन है,
हाँ! दृष्टी बाध्य है, पर हृदय में उत्साह है,
सच अच्छा लगता है,
रंगों को फीका देखना,
सच सच्चा लगता है,
लहू की धीमी चाल देखना,
सच यह भी अच्छा है,
की सूर्य आज मयंक है,
और अच्छा यह भरम है,
की प्रकृति की चाल मंद है,
भरम भी आवश्यक है,जीवन जीने के लिए,
और धुँध एक मानक है, जीवन कहने के लिए,
कल फीका धुंधला है,
कल गहरी धुँध है,
पल भर की दृष्यता,
फिर धुँधला सा रूप है,
धुंधला यह जीवन है, और धुँध ही साहस है,
धुँध कुछ पल की ही, सत्यता का आभास है।

4 thoughts on “धुँध

  1. Sometimes the utter lack of clarity in life, frightens us. But that is the precise moment when we live – in that precious moment of mist and grief. All else is mere play-acting..

    The most concrete poem of yours..Bravo!

    Like

  2. Beautiful. Mist mesmerizes because of the mystery. Unveiling it again and again is the beauty. Keep your creativity. Be bold and happy.

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s